एक शीतकालीन सुबह की कविता

ऐसा बगीचा मैंने पहले कभी नहीं देखा था,

नहीं देखे थे कभी इतने फूल और भँवरे।

पेड़ों की ओट में छिपा हुआ यौवन,

सीमेंट के चबूतरों पर सुस्ताता हुआ बुढ़ापा,

घास के कलीचे पर खेलता हुआ भविष्य,

और पगडंडी (वॉक-वे) पर—

कुछ अस्वस्थ शरीरों को सुधारने के प्रयास में जुटा यह समय।

फ़व्वारे से गिरता हुआ पानी

सुबह की धूप में इंद्रधनुष गढ़ रहा था।

घास पर बिखरी ओस की बूंदें मोतियों का भ्रम पैदा कर रही थीं,

पर बेंच पर खिले हुए वे फूल

कोई भ्रम नहीं थे, वे बेहद ताज़ा और सच्चे लग रहे थे।

रात भर की सारी थकान को

कंबल के भीतर ही छोड़ कर,

वह अपने ऊनी कपड़ों में सुबह की उस धूप को समेट रही थी।

होठों का रंग अभी फीका नहीं पड़ा था,

आँखों से काजल अभी छूटा नहीं था।

ढलते हुए घूंघट को संभालते हुए,

वह अपनी पायल ठीक कर रही थी।

धीमी पड़ गई थीं उसकी राहें,

लजा गई थीं उसकी आँखें।

चलते-चलते थक चुके उस

पसीने से तरबतर शरीर को जैसे ही उसने सीधा किया…

तभी कुकर की सीटी से नींद टूट गई!

रसोईघर से आवाज़ आ रही थी—

“आज वॉक (सैर) पर नहीं जाओगे क्या…?

बहुत देर हो रही है!”

— रत्नमय त्रिपाठी

अध्ययन, बलांगीर

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Original Odia : Ratnamaya Tripathy

Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy

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ରତ୍ନମୟ ତ୍ରିପାଠୀ

ତ୍ରସ୍ତ ହୃଦୟ ନ୍ୟସ୍ତ କାହାପାଖେ, ଗସ୍ତ ମୋ ବନସ୍ତରେ l ଅନ୍ତ ନାହିଁ ଏବେ ଅନନ୍ତ ଆକାଶେ, ବ୍ୟସ୍ତ ମୁଁ ଉଡିବାରେ ll

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