अब, फिर से कुछ समय के लिए
मौन (खामोश) रहना होगा।
पानी के भीतर फेंके गए एक छोटे से कंकड़
की तरंगों से जो सुनामी उठी है,
अब उसका सामना करना होगा।
कौन जानता था कि बहते पानी में
तैर कर आए एक केकड़े के डंक से,
यूं ही मिट जाएगा
एक पुराना और गहरा रिश्ता!
अब कोई नया रिश्ता बनाए बिना,
बस मौन रहना होगा।
कभी-कभी आईना भी झूठ बोल जाता है,
और अपनी ही परछाई भूल कर बैठती है
ज़िंदगी के सारे गणित में।
कौन जानता था कि नए रोपे गए पेड़
इतनी जल्दी विषैले फल देंगे!
अब इस सारे हलाहल (ज़हर) को पीकर,
नीलकंठ बनना होगा।
राह भटके मुसाफिर को रास्ता मत दिखाओ,
भूखे को एक बूंद मांड (तोराणी) भी मत दो।
क्या पता, सहायता के लिए बढ़ाए गए उसी हाथ में,
लोहे की ज़ंजीरें बांधनी पड़ जाएं!
झूठ और सच के इस चौसर के खेल में,
झूठ जीत जाता है।
सच को सच कहने का
मौका तक नहीं मिलता।
समय की टिक-टिक करती आवाज़ को खुद में सोखकर,
अब बहुत दिनों तक,
मौन रहना होगा…
—————–
— रत्नमय त्रिपाठी
अध्ययन, बलांगीर
—————–
Original Odia : Ratnamaya Tripathy
Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy
Want to read this poem in Odia ? Click Here
Want to read this poem in English ? Click Here
