सपनों का महल

एक अलसाई सुबह में यह मनमौजी हवा

मन को अनमना (व्याकुल) कर देती है।

असमय किए गए आने के सारे वादे

दिल को और अशांत कर देते हैं।

यहाँ पूरे आँगन में भारी अफ़सोस पसरा है;

अगर तुम आओगे भी, तो कौन सी उम्मीद लेकर आओगे?

बिना किसी वजह के आकर भला

फिर से अपवाद (कलंक/लांछन) क्यों सुनोगे?

देखो……

मेरे पूरे बदन पर लगे हैं

दंश (अपनों के डंक) के निशान।

यह निष्ठुर भाग्य केवल दुःख देकर

चला जाता है।

दूर का कोई पंछी भी दूर से आकर यहाँ

अपनी दिशा नहीं भटकता।

दिन के उजाले में मेरी दशा तो देखो—

कितनी जटिल और दयनीय है।

फागुन में तुमने कहा था कि रंगों से खेलेंगे,

सात रंगों के सपनों का एक महल (सौध) गढ़ेंगे।

पर सिर्फ वादों की हथेली पर कभी घर नहीं बनता;

प्रेम का आशियाना बनाने के लिए तो

हाथ से हाथ का मिलना ज़रूरी होता है।

— रत्नमय त्रिपाठी

अध्ययन, बलांगीर

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Original Odia : Ratnamaya Tripathy

Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy

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ରତ୍ନମୟ ତ୍ରିପାଠୀ

ତ୍ରସ୍ତ ହୃଦୟ ନ୍ୟସ୍ତ କାହାପାଖେ, ଗସ୍ତ ମୋ ବନସ୍ତରେ l ଅନ୍ତ ନାହିଁ ଏବେ ଅନନ୍ତ ଆକାଶେ, ବ୍ୟସ୍ତ ମୁଁ ଉଡିବାରେ ll

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