सूखती हुई नदी में, एक उपनदी बनकर
उसे सदावाहिनी (चिरस्रोता) बनाए रखने की कामना रखने वाले;
ढीली पड़ती हुई हाथ की मुट्ठी को
और अधिक मज़बूत करने के लिए
अपना हाथ आगे बढ़ाने वाले;
सारे झूठ को ढँककर (परास्त कर),
सत्य का सामना करने के लिए
भीतर साहस जगाने वाले;
चट्टान को चीरकर ऊपर उठने के संघर्ष में,
जो जड़ और खाद… दोनों बन जाते हैं;
ऐसे सभी श्रेष्ठ चरित्र वाले इंसान ही… सच्चे मित्र होते हैं।
— रत्नमय त्रिपाठी
अध्ययन, बलांगीर
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Original Odia : Ratnamaya Tripathy
Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy
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