अभी कुछ शब्द कहने बाकी हैं,
अभी कुछ शब्द सुनने बाकी हैं।
पूरे करने बाकी हैं कुछ वादे,
चुकाने बाकी हैं कुछ ऋण।
कुछ अनाम कविताओं को अभी शीर्षक देना बाकी है,
शब्दों के कुछ पेड़ों को अभी यत्न से बड़ा करना बाकी है।
जो लोग बिना कुछ कहे चले गए,
उनकी स्मृति में अभी मौन रहना बाकी है।
लेन-देन के इस संसार से जाते समय जो आत्माएं कुछ साथ नहीं ले गईं,
उनसे उनकी अर्जित धन के मालिकाना हक के बारे में पूछना बाकी है।
बाकी है अभी बही-खाते का हिसाब,
बाकी है अभी देव-ऋण का हिसाब,
बाकी है अभी देशभक्ति का हिसाब।
उम्र की उन अनगिनत, रातों की बेकरारी और अनकहे लम्हों को,
सुबह होने से पहले, किनारे तक पहुँचाना बाकी है।
लगाए हुए कृष्णचूड़ा (गुलमोहर) के पेड़ पर अब फूल नहीं आते,
सारे पत्ते झाड़ चुके उस बगीचे में एक बार फिर,
पानी सींचना बाकी है।
मिट्टी से आसमान की दूरी को मापते-मापते,
जितनी भी उम्र थी, वह अब समाप्त हो चुकी है।
क्षितिज को देखने के बाद,
अब खुद पर ही एक आत्म-व्यंग्य की हंसी हंसना बाकी है।
अभी-अभी ऊपर की ओर उठे हुए हाथ को सीधा कर,
अपने प्रिय शहर के सीने से अपना नाम मिटाकर,
बस एक अंतिम शब्द कहना बाकी है… “विदा।”
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— रत्नमय त्रिपाठी
अध्ययन, बलांगीर
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Original Odia : Ratnamaya Tripathy
Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy
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