लौटते हुए कदम (फेरि आशुथिबा पाद)

ऐसा गहरा अँधेरा

जहाँ अपनी परछाई भी दिखाई न दे,

अब बहुत आत्मीय (अपना सा) लगता है।

सपने चले आते हैं,

यह जाने बिना कि आज

अमावस्या है या पूर्णिमा।

छत पर बैठे कबूतर

जब टुकड़े-टुकड़े अनाज चुगते हैं,

तो एक धुंधली सी तस्वीर उकेर जाते हैं।

वह तस्वीर कभी-कभी साफ़ दिखाई देती है,

तो कभी जीवित होकर डराती है।

वह सारे दफ़न रहस्यों को

न बताने की शर्त रखती है।

“देखो… मैं अभी आया” कहकर

जो वादे गए थे,

वे फिर कभी लौटकर नहीं आते।

और जो लौटते भी हैं,

वे रोज़मर्रा के झंझटों भरे रास्तों पर

राह भटक कर भूल जाते हैं।

ऋतुचक्र से बसंत को

विदा करते समय, उसने एक मुट्ठी अबीर माँगा था।

मैं दे न सका, बस इसीलिए

यह फागुन आज तक रूठा हुआ है।

अभी-अभी,

ऊपर की सीढ़ी से

नीचे की सीढ़ी की ओर

लौट आए ये कदम

पूछते हैं—

वह तस्वीर किसकी है…?

क्या रहस्य है उसका…?

आगे की ओर बढ़ते हुए कदम

अब धीरे-धीरे पीछे की ओर लौट रहे हैं।

ये निरुत्तर (मौन) होंठ,

इस असहाय काया के साथ,

और वह मासूम परछाई,

धीरे-धीरे उस अँधेरे में विलीन होती जा रही है।

— रत्नमय त्रिपाठी

अध्ययन, बलांगीर

—————–
Original Odia : Ratnamaya Tripathy

Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy

Want to read this poem in Odia ? Click Here

Want to read this poem in English ? Click Here

ରତ୍ନମୟ ତ୍ରିପାଠୀ

ତ୍ରସ୍ତ ହୃଦୟ ନ୍ୟସ୍ତ କାହାପାଖେ, ଗସ୍ତ ମୋ ବନସ୍ତରେ l ଅନ୍ତ ନାହିଁ ଏବେ ଅନନ୍ତ ଆକାଶେ, ବ୍ୟସ୍ତ ମୁଁ ଉଡିବାରେ ll

Leave a Reply