किसी ने कहा था
कि सारी रात खिड़की को खुला रखना।
वो अनुरोध था या आदेश—
यह जाने बिना ही,
मैंने खिड़की खुली रख दी।
रात के पहले प्रहर में मोगरे (मल्लिक) की महक आई,
दूसरे प्रहर में चमकीला, साफ़ चाँद मुस्कुराया।
तीसरे प्रहर में किसी अंजान पंछी की आवाज़ आई,
और चौथे प्रहर में असमय की बारिश ने आकर—
खिड़की की रेलिंग के साथ-साथ भिगो दिया
मेज़ पर रखे कैलेंडर,
कविता की डायरी और गुलदस्ते को।
फिर भी, वह खिड़की खुली ही रही।
सुबह मैंने पूछा,
“क्यों कहा था तुमने रात को
खिड़की खुली रखने के लिए…?”
उसने मंद-मंद मुस्कुराते हुए कहा,
“बुद्धू……
कल रात तुम सो नहीं पाए न?
सारी रात बस मेरे ही ख्यालों में खोए रहे।
इसीलिए तो मैंने कहा था
कि खिड़की खुली रखना……”
— रत्नमय त्रिपाठी
अध्ययन, बलांगीर
Original Odia : Ratnamaya Tripathy
Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy
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