अगर एक बार फिर से समुद्र मंथन हो,
तो तुम किस पक्ष की ओर से शामिल होना चाहोगे?
क्या तुम अमृत के बँटवारे के समय
समान अधिकार के लिए लड़ सकोगे?
एक तपस्वी बनकर क्या तुम मना कर पाओगे
स्वर्ग से भगीरथी (गंगा) को धरती पर लाने के लिए?
भरत बनकर खड़ाऊँ (पादुका) को न पूजते हुए,
क्या तुम श्रीराम को वापस लौटा लाओगे?
अर्जुन बनकर क्या तुम युद्ध के उस
दृढ़ संकल्प को रोक सकोगे?
क्या तुम एक क्षण में बदल सकोगे इस सत्य को कि
“कामना के विनाश से ही दुखों का विनाश होता है”?
महोदधि (विशाल समुद्र) में उस दारु (लकड़ी के लट्ठे) को
तैरने न देकर,
क्या तुम विश्वावसु बनकर सुरक्षा दे सकोगे
अपने प्रिय नीलमाधव को?
भला किसके निर्देश पर घटती हैं ये घटनाएँ?
किसके इशारे पर बदल जाता है यह ऋतुचक्र?
यदि सब कुछ तुम्हारी ही मुट्ठी (नियंत्रण) में है,
तो फिर, इंसानी जीवन का यह प्रहसन (तमाशा) देखकर
तुम क्यों इतने मौन हो, हे नीरद ईश्वर (मौन भगवान)…….?
— रत्नमय त्रिपाठी
अध्ययन, बलांगीर
Original Odia : Ratnamaya Tripathy
Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy
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