बारिश… एक स्केच कविता
उसकी भीगी हुई आँचल (पड़त) से ममत्व (वात्सल्य) का झरना झर रहा था। पर अपने बीमार बच्चे के मुँह में निवाला देने के लिए, उसके स्तनों से दूध (अमृत) की धार सूख चुकी थी। 'काल बैसाखी' के तूफ़ान में उड़ गया जो छप्पर का एक हिस्सा, वह आज तक सुधारा नहीं जा सका; प्रशासन की ओर से मिलने वाली सहायता का वादा आज तक सिर्फ़ एक वादा ही बनकर रह गया है। ज़्यादा कमाने की आस में दलाल के साथ गया वह आदमी फिर कभी वापस नहीं लौटा। और वह तेरह साल की मासूम बेटी, जिसे सरपंच ने अपने घर यह कहकर बुलाया था कि वह उसे ओढ़ने के लिए एक पॉलिथीन की त्रिपाल देगा— वह बेटी उस दिन के बाद से आज तक घर नहीं आई। बारिश में ढहती हुई उस मिट्टी की दीवारों के भीतर से, छत की वे नंगी लकड़ियाँ (बल्लियाँ) बेहद बेबस दिख रही थीं। भरे यौवन में पूरी तरह टूट चुके एक मन को समेटे, वह अपने उन भीगे कपड़ों में ही किसी तरह बदन को ढँक रही थी। उसे रह-रहकर बचपन का वह गीत याद आ रहा था: "मेघ बरसे टुपूर-टापूर, केसूर (सिंघाड़े) में फूटे अंकुर, किस परदेस में रह गए मेरे राजा, जाओ, बजाओ ढोल और बाजा..." यहाँ अब उसे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। आँखों से लगातार आँसुओं की धार बह रही थी, और बाहर बादलों से बारिश की झड़ी लगी थी। बिजली की कड़क और बादलों की गड़गड़ाहट के बीच, रात के उस स्याह अँधेरे में विलीन हो रही…
