आओ, कुछ देर ख़ामोशी से बैठते हैं

आओ, कुछ देर ख़ामोशी से बैठते हैं।

बाहर चाहे किसी भी मौसम की महफ़िल सजी हो,

हम बस कोणार्क की मूर्तियों की तरह ठहर जाएँगे।

हमें देखकर जिसके मन में जो भी विचार आए आए,

हम बस एक-दूसरे के ख्यालों में खोए रहेंगे।

आओ, कुछ देर ख़ामोशी से बैठते हैं।

तुम्हें याद होगी न बचपन की वह शाम—

नदी का किनारा, बगीचों की छाँव, और छुपन-छुपाई का खेल।

वह झूठा रूठना-मनाना, और वो छोटी-छोटी नाराज़गियाँ (अभिमान)।

चलो, बचपन की उन कागज़ की नावों को एक बार फिर ढूँढते हैं।

आओ, कुछ देर ख़ामोशी से बैठते हैं।

तुम्हारी जुदा हुई जुल्फों (जूड़े) से गिरा वह फूल,

रफ़ कॉपी में लिखी वह आधी-अधूरी कविता,

तुम्हारी वह पायल—जिसे तुमने यह कहकर छिपा दिया था

कि वह नदी की रेत में कहीं खो गई और मिली ही नहीं,

और फागुन में तुम्हारे हाथों से लगा वह गुलाल—

आज भी मेरे पास महफूज़ (सहेज कर) रखा है।

चलो, पुरानी डायरी खोलकर यादों की कोई गज़ल पढ़ते हैं।

आओ, कुछ देर ख़ामोशी से बैठते हैं।

बारिश की बूंदों से मन में एक मादकता घुलने दो,

सर्दियों की धुंध में बदन को प्रेम की गर्माहट ढूँढने दो।

चाहे गर्मियों की वह तपती धूप हो या बसंत की ठंडी हवा,

चलो तन्हाई में बैठकर इस मोहब्बत को महसूस करते हैं।

आओ, कुछ देर ख़ामोशी से बैठते हैं।

मैं जानता हूँ कि तुम्हें ज़माने की नज़रों से बहुत डर लगता है,

और एक मैं हूँ जो हर तूफ़ान को सीने पर झेल लेता हूँ।

यहाँ हमारे इस सुकून के दो पलों को लेकर

किसी और के बेडरूम में तमाशा (शोर) खड़ा हो सकता है;

इसीलिए चलो अपने चारों तरफ़ एक ख़ूबसूरत दीवार चुन लेते हैं।

आओ, कुछ देर ख़ामोशी से बैठते हैं।

तुम मना कर सकती हो स्नेह का यह गुलाल लगाने से,

तुम अपनी नज़रें फेरकर ठुकरा सकती हो

मेरे हाथों से दिया गया चाहत का यह तोहफा।

पर मेरा वादा है, न मैं कोई सवाल करूँगा,

और न ही कभी कोई जवाब माँगूँगा।

हम दोनों बस ख़ामोशी से इस प्रेम के रंग में भीगते रहेंगे।

आओ, कुछ देर ख़ामोशी से बैठते हैं।

— रत्नमय त्रिपाठी

अध्ययन, बलांगीर


Original Odia : Ratnamaya Tripathy

Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy


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ରତ୍ନମୟ ତ୍ରିପାଠୀ

ତ୍ରସ୍ତ ହୃଦୟ ନ୍ୟସ୍ତ କାହାପାଖେ, ଗସ୍ତ ମୋ ବନସ୍ତରେ l ଅନ୍ତ ନାହିଁ ଏବେ ଅନନ୍ତ ଆକାଶେ, ବ୍ୟସ୍ତ ମୁଁ ଉଡିବାରେ ll

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