निरंशु (किरण-रहित / आभा-हीन)

मैंने जितनी भी बार तूलिका (ब्रश) उठाकर

खुद का चित्र बनाना चाहा,

हर बार मुझे अपना नहीं,

बल्कि किसी और का ही चेहरा दिखाई दिया।

एक नहीं, दो नहीं,

पूरे के पूरे सात चित्र।

उन चित्रों में कभी खुद को न पाकर,

आख़िरकार मैंने यह प्रयास ही छोड़ दिया।

दीवार घड़ी की टिक-टिक की आवाज़ में,

मैंने रात की धड़कनों को नापा।

गर्म चाय की हर चुस्की में मैंने सुनी

इस अलसाई रात की खर्राटें।

दूर किसी अज्ञात पंछी की आर्तनाद (दर्द भरी चीख़) में

मुझे किसी बेबस, मासूम अबला की चीख सुनाई दी।

सियार (गीदड़) की ‘हुक्के-हो’ की आवाज़ में,

मुझे शासक की नाकामी की वो व्यंग्य भरी हँसी सुनाई दी।

गली के कुत्तों के भौंकने के शोर में,

जब कोई अपराधी आराम से साफ़ बचकर निकल गया,

तब मुझे जनता द्वारा उसकी गिरफ़्तारी की माँग के नारे सुनाई दिए।

इस बार, चौकीदार की

तीखी सीटी की आवाज़ से

पूरी रात सहमकर शांत हो गई।

एक फरमान सुनाई दिया: “जो जहाँ है, जैसा है,

वैसा ही बना रहे,

कोई प्रतिवाद (विरोध) या पलटकर सवाल मत करना।

आगे ‘अच्छे दिन’ आने वाले हैं।

अगर सब कुछ ख़ामोशी से सहकर ज़िंदा रह पाए,

तो ‘विश्वगुरु’ का विश्वरूप देख पाओगे।

तुम प्रभु के भक्त बनो या न बनो,

पर ‘अंधभक्त’ ज़रूरी ही बन जाओ,

वरना यह देश छोड़कर चले जाओ!”

तभी, अलसुबह साग बेचने वाले और मछली वाले के

मिले-जुले शोर (कोरस) से

मेरी नींद टूट गई।

सामने वाली सड़क पर कोई ज़ोर से कह रहा था—

“भला कार्तिक के इस पवित्र महीने में मछली कौन खाएगा हो…!

ऐ साग वाले, मुझे साग दे!

इस कमरतोड़ महँगाई के दौर में,

हविष्याली (व्रतधारी साधु) बन जाना ही सबसे बेहतर है।”

— रत्नमय त्रिपाठी

अध्ययन, बलांगीर


Original Odia : Ratnamaya Tripathy

Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy


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ରତ୍ନମୟ ତ୍ରିପାଠୀ

ତ୍ରସ୍ତ ହୃଦୟ ନ୍ୟସ୍ତ କାହାପାଖେ, ଗସ୍ତ ମୋ ବନସ୍ତରେ l ଅନ୍ତ ନାହିଁ ଏବେ ଅନନ୍ତ ଆକାଶେ, ବ୍ୟସ୍ତ ମୁଁ ଉଡିବାରେ ll

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