समय की प्रतीक्षा में…
श्रावण की वर्षा से भीगी हुई मिट्टी में बो दो स्मृतियों के सारे बीज। वे अंकुरित हों या न हों, आशा और विश्वास की खाद देकर नोच लो निराशा की अनचाही, जंगली घास को। प्रतीक्षा करो… प्रतीक्षा करो… परंतु, 'अमृत काल' में रोपे गए पेड़ पर अमृत ही फलेगा— यह अंधविश्वास मत रखना। दूर क्षितिज पर दिखते हुए इंद्रधनुष से चुन लो वह रंग जो तुम्हें रास आए। उस रंग को लेकर राजनीति करो, ईश्वर को गढ़ो, या फिर खुद ही ईश्वर के दूत बन जाओ! एक नया इतिहास रचा जा चुका है, अब अपना मुंह बंद रखो और उसका समर्थन करो। राजमार्ग पर खड़े होकर घोषणा करो अपनी जाति की, अपने इतिहास की और अपनी जन्मभूमि की! नदी के कछार पर खिले काश-फूलों (काशतंडी) की ओट में मत छुपाओ अपनी इस कलंकित देह को। पारिजात के रंगों में भीगे अपने इस मन को किस नदी के पानी में धोओगे? किस घाट पर नहाकर पवित्र करोगे अपनी आत्मा को? किस पहाड़ की चोटी पर जाकर घोषणा करोगे अपनी राष्ट्रीयता की? प्रतीक्षा करो… बोए हुए स्मृतियों के वे सारे बीज चट्टान को चीरकर ऊपर उठेंगे। सफलता की फसल बटोरकर, यह जाति, यह देश फिर से मुस्कुराएगा। —————– — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here
