मैं अपने ही भीतर सिमट गया,
बसेरा छोड़कर उड़े सारे पक्षी अब लौट आए हैं।
पक्षी के एक नन्हे बच्चे ने सुबह को टकटकी लगाकर देखा,
दूर का पहाड़ और नज़दीक चला आया,
और आत्मीयता का भाव और गहरा हो गया।
आजकल मुझे अपना शहर बहुत अच्छा लगता है—
विकास की राह पर बढ़ती ये सड़कें।
विस्थापितों के लिए
“सबके लिए घर, घर में नल, नल में जल”
सुन-सुनकर मैं बहुत खुश हुआ।
खुद को अपने ही भीतर ढूंढ पाना ही ज़िंदगी है।
समय के साथ धीरे-धीरे जुड़ते हुए रिश्तों को
सदा जोड़े रख पाना ही ज़िंदगी है।
किसी को अपने सीने (दिल) में थोड़ी सी जगह देना ही आत्मीयता है,
और किसी की आँखों से एक बूंद आँसू भी न बहने देना
शायद यही प्रेम है।
मैं प्रेम का कोई दूसरा अर्थ नहीं जानता,
मैं नहीं जानता कि मैं किससे प्रेम करूँगा।
मैं नहीं बता सकता प्रेमिका की आँखों का पता,
मैं नहीं बता सकता कि क्यों नींद उड़ जाती है
किसी के पायलों की झंकार से।
मैं नहीं बता सकता कि कितनी आत्मीयता होती है
प्रेमिका के गहरे आलिंगन में।
मैं नहीं समझ पाता
कि प्रेमिका की हँसी में मुक्ति है या बंधन,
कामना है या सिर्फ एक छलावा।
मैं तो बस चाहता हूँ कि मुक्ति का एक मार्ग हो,
खुद जीकर दूसरों को भी जीने देने की
एक सुंदर भावना हो।
प्रेम हो या न हो,
पर शुभकामनाओं का वह प्रेम-पक्षी
मुक्त आकाश में सदा
अपनी उड़ान भरता रहे।
— रत्नमय त्रिपाठी
अध्ययन, बलांगीर
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Original Odia : Ratnamaya Tripathy
Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy
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