“अरे… मैं आ रहा हूँ” ——-
तुम्हारे इस “मैं आ रहा हूँ” का सच जानने के लिए,
मैं कभी पूछ ही नहीं पाया कि तुम कब आ रहे हो,
और न ही कभी यह जवाब दे पाया कि तुम कब लौटोगे।
अब, भला क्या कहकर ढांढस बंधाऊँ
उस साठ साल के बूढ़े बाप को……
जो अपने तीस साल के जवान बेटे की अर्थी को कंधा देकर,
अभी-अभी श्मशान में उसे मुखाग्नि देकर लौटा है?
भला क्या कहकर बहलाऊँ
उस अभागन माँ के दिल को,
जो आज भी सुबह होते ही
बाड़ी (बागीचे) से तोड़कर लाती है तुम्हारी पसंद का मुनगा (सहजन) का साग?
भला मैं क्यों एकदम खामोश हो जाता हूँ
उन मासूम होठों के इस सीधे से सवाल पर—
“अंकल…… पापा कब आएँगे…?”
आज तक मुझमें इतनी हिम्मत नहीं हुई कि मैं देख सकूँ
उन दो आँखों में,
जिन्हें मैं जाते-जाते यह तसल्ली देकर गया था—
“धीरज रखो…. चिंता मत करो,
सब ठीक हो जाएगा।”
पर यहाँ तो कुछ भी ठीक नहीं हुआ।
आज भी सुबह की शुरुआत होती है
एम्बुलेंस के सायरन की चीख से,
और रात ढलती है श्मशान की दहकती आग के साथ।
कल तुम्हारा घर था…… आज किसी और का घर है।
बहन की शादी के लिए लिया गया कर्ज़
आज भी चुकाना बाकी है।
जब तुम दो हाथ हुए थे (तुम्हारी शादी हुई थी) तब
जो घर बनना शुरू हुआ था—
वह आज तक अधूरा ही खड़ा है।
यह सोचकर कि परिवार की सारी ज़िम्मेदारियाँ ख़त्म हो गईं,
जो कदम ‘भागवत टुंगी’ (प्रार्थना सभा) की ओर बढ़ रहे थे,
वे पैर आज बुढ़ापे में फिर से काम की तलाश में भटक रहे हैं।
भला मैं कैसे समझाऊँ उन्हें……
कि इस दौर में साठ साल से ऊपर के बुजुर्गों का
घर से बाहर न निकलने का सरकारी नियम है?
उनके हाथों में अब इतनी जान भी नहीं बची कि मैं उनसे कह दूँ—
“जाओ, खुद ‘आत्मनिर्भर’ बन जाओ।”
अब तो राह चलते किसी को भी देखकर
यह पूछने में भी डर लगता है कि—
“कैसे हो……?”
और भला किससे उम्मीद से पूछूँ कि “कब आओगे…?”
दिल काँप उठता है कि कहीं वो भी
“अरे….. मैं आ रहा हूँ” कहकर,
हमेशा-हमेशा के लिए मुझे अकेला छोड़कर न चला जाए………
— रत्नमय त्रिपाठी
अध्ययन, बलांगीर
Original Odia : Ratnamaya Tripathy
Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy
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