सब कुछ तो लौट आया है…
एक बार फिर उस ठूंठ पेड़ पर
कौंपलें फूट पड़ी हैं।
बाड़ी के आम के पेड़ पर
बौर आ गए हैं।
मल्लिक (मोगरे) की महक से
आँगन महक उठा है।
फाल्से के सारे पेड़
लाल फूलों से भर गए हैं।
अकेले उड़ते पक्षियों ने
चुन लिए हैं अपने-अपने बसेरे।
अब पार्क में खाली नहीं बचता
एक भी बेंच।
गुपचुप (गोलगप्पे) के ठेले के पास
भारी भीड़ उमड़ती है।
फूलों की दुकान पर नहीं बचता
एक भी बासी फूल।
अब पहले की तरह,
गलत पते पर नहीं भटकती
एक भी चिट्ठी।
नए-नए खरीदे गए रेडियो पर
रोज़ बजते हैं सदाबहार गीत।
तुम्हारे आने की राह को
टकटकी लगाकर देखने वाले लोग,
अब ‘मनरेगा’ के काम में व्यस्त हैं।
खुसर-पुसर बातें करने वाली
वे अनपढ़ औरतें,
अवैध कब्जा हटाओ अभियान के कारण
शहर से बाहर हो चुकी हैं।
‘आज़ादी का अमृत महोत्सव’ में,
तिरंगी रोशनी के साथ
जगमगा रहा है मेरा प्रिय शहर।
विकास और विस्थापन दोनों एक साथ मिलकर
खेलते हैं फागुन का अबीर।
सब कुछ तो लौट आया है…
समय के साथ कोई भी नहीं रूठा।
तुम ऐसा कौन सा अभिमान (नाराज़गी) लेकर चले गए कि—
गर्मी, बरसात और सर्दी बीत गई,
बसंत भी लौट आया,
पर तुम नहीं आए।
— रत्नमय त्रिपाठी
अध्ययन, बलांगीर
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Original Odia : Ratnamaya Tripathy
Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy
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