अपने भाग्य और भविष्य की रेखाओं को
खुद पूरी तरह पढ़ लेने के बाद भी,
तुम इतनी ख़ुशी के साथ
रह कैसे लेते हो…?
अपने प्रियजनों से इतनी दूर रहकर भी,
कैसे जोड़ लेते हो
श्रद्धा और स्नेह के ये रिश्ते…?
सामने पूरा का पूरा स्याह, अँधेरा रास्ता है,
फिर भी कहाँ से पाते हो इतना साहस
आगे बढ़ते जाने का…?
राह भर खड़ी इन सवालिया आँखों के बीच भी,
तुम कैसे तय कर लेते हो अपना सफ़र…?
इन जाने-पहचाने चेहरों की भीड़ में,
क्या तुम देख नहीं पाते
उनकी वह उपहास और व्यंग्य भरी हँसी…?
यहाँ उजाला आने पर खुद अपनी परछाई भी
काया का साथ छोड़ देती है।
दाहिने हाथ के ज़ख्म पर
मरहम लगाने के लिए,
बायाँ हाथ भी नफ़रत (घृणा) करने लगता है।
शुभकामनाओं के इन मीठे संदेशों के भीतर छिपे
आलोचना के उस हलाहल (ज़हर) को
क्या तुम देख नहीं पा रहे हो…?
अमृत का कलश देखकर,
आँखें मूँदकर उसे पीने से ठीक पहले,
एक बार चाणक्य के उस श्लोक को याद ज़रूर कर लेना!
— रत्नमय त्रिपाठी
अध्ययन, बलांगीर
Original Odia : Ratnamaya Tripathy
Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy
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