देर रात तक मुझे ऑनलाइन देखकर
यह मत सोच लेना कि तुम्हारी यादों में
मेरी नींद उड़ गई है।
मोबाइल डेटा बंद किए बिना सो जाना
अब बस मेरी एक आदत सी बन गई है।
जब तुम फ़ोन करती हो, तो नंबर व्यस्त (Busy) आता है क्या…?
हाँ…… हर वक़्त काम में मसरूफ़ (व्यस्त) रहना
अब मेरा कर्तव्य बन गया है।
रोज़ अपने घर के सामने से मुझे आते-जाते देखकर
यह मत समझ लेना कि तुम बालकनी में आकर दिख जाओ।
तुम्हें देखने के लिए नहीं रे—
उस पार का रास्ता बंद पड़ा है,
इसलिए तुम्हारी घर वाली गली से गुज़रना अब मेरी मज़बूरी बन गया है।
इतवार (रविवार) की सुबहें कभी सिर्फ़ तुम्हारे नाम हुआ करती थीं,
पर अब हर दिन की सुबह
सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरी होती है।
प्रेम और विरह को लेकर कविताएँ लिखना
अब बहुत पुरानी बात हो गई है।
सुना है कि तुम फेसबुक पर मेरी कविताएँ पढ़ती हो…?
हर कविता के भीतर भला तुम खुद को
क्यों ढूँढती फिरती हो…?
शायद तुम्हें इस बात का इल्म (पता) नहीं है—
गहरे प्रेम में किसी को भी याद करना
अब मेरे लिए पूरी तरह वर्जित हो चुका है।
— रत्नमय त्रिपाठी
अध्ययन, बलांगीर
Original Odia : Ratnamaya Tripathy
Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy
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