प्रेम के रंग में भिगोऊँगा तुम्हें

अब तुम्हें सात रंग नहीं दूँगा,

तुम्हारे लिए अब सिर्फ प्रेम का रंग बचाकर रखा है।

पतझड़ से ठूंठ बने इस शरीर पर

एक बार फिर हरी पत्तियाँ उग आई हैं।

देखो!!!

देखो कि अब मैं कैसे सदाबहार हूँ।

बहुत दिनों से राह भटके उस भँवरे को

मैं बगीचे में वापस बुला लाया हूँ।

तुम्हारे इशारे पर वह मँडराएगा

इस फूल से उस फूल तक।

तुम्हारे स्वागत के लिए मैंने रखा है

एक काँटों से रहित गुलाब।

मोगरे (मल्लिक) के फूलों की महक से आँगन को महकाया है,

और अभी-अभी बौर आए आम के घने पेड़ पर कोयल से कह दिया है—

कि वह तुम्हारे लिए स्वागत-गीत गाए।

गुलमोहर (कृष्णचूड़ा) के सारे पेड़ दिखेंगे

और भी ज़्यादा रंगीन।

इस बार जब तुम आओगे,

तो मैं कतई नहीं कहूँगा कि मैं बहुत व्यस्त हूँ।

तुम्हारे लिए कविताएँ लिखूँगा।

अगर तुम चाहोगी, तो सम्मोहन (मोह लग्न) के कवि से माँगकर

तुम्हें प्रेम के गीत सुनाऊँगा, रात-रात भर जागकर।

तुम्हारे जागने के बाद ही सुबह होगी,

और तुम्हारे सो जाने पर रात हो जाएगी।

जो तुम चाहोगी वही होगा,

मैं सब कुछ सहर्ष (सिर झुकाकर) स्वीकार करूँगा।

फागुन के रंगों में तो कई बार भिगोया है तुम्हें,

इस बार सिर्फ प्रेम के रंग में भिगोऊँगा तुम्हें।

सर्दियाँ बीत चुकी हैं और बसंत का आगमन हो चुका है,

पतझड़ की तरह हमारा मन और हमारी उम्र न झड़े।

चाहो तो इस बेला में आकर

परोस देना प्रेम का पीयूष (अमृत)…

परोस देना प्रेम का पीयूष।

— रत्नमय त्रिपाठी

अध्ययन, बलांगीर

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Original Odia : Ratnamaya Tripathy

Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy

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ରତ୍ନମୟ ତ୍ରିପାଠୀ

ତ୍ରସ୍ତ ହୃଦୟ ନ୍ୟସ୍ତ କାହାପାଖେ, ଗସ୍ତ ମୋ ବନସ୍ତରେ l ଅନ୍ତ ନାହିଁ ଏବେ ଅନନ୍ତ ଆକାଶେ, ବ୍ୟସ୍ତ ମୁଁ ଉଡିବାରେ ll

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