खिड़की के उस पार की ठंड

अभी-अभी, घर के भीतर से

बाहर निकल चुकी है यह ठंड—

तन से, मन से और विचारों से।

किसी के फ़ोन कॉल से

अचानक टूटी हुई यह नींद

एक गर्माहट भरी छुअन ढूँढती है।

चाय के कप की खुशबू में,

लिखी जा चुकी दिन की नई समय-सारणी (Routine)

बिल्कुल अनूठी लगती है।

मोबाइल के ये सारे संदेश

अब उतना उत्साह नहीं जगाते।

फिर भी, किसी के निश्चित बुलावें की आस में

कदम आगे बढ़ तो जाते हैं…

पर कमबख्त यह आलस अभी तक टूटता नहीं।

“बहुत दिन हो गए तुम सैर (Walk) पर नहीं आए;

इस ठंड से डर रहे हो…

या अपने किए वादों से?”

रात के वे हसीन सपने,

वे आधी लिखी अधूरी कविताएँ,

और बदन की वह गर्माहट

इस कंबल के भीतर कितनी मासूम लगती हैं।

पर बाहर,

आँचल में सिमटी हुई वह धुंध,

हथेलियों पर थमी ओस की बूंदें,

और आँखों में ढलती सुबह की वह कोमल किरण—

सब बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं।

आधी रात तक चाव से पढ़ी गई

उस सम्मोहन (मोह लग्न) की कविताओं की तरफ

अब हाथ आगे नहीं बढ़ते।

एक व्याकुल आलिंगन की आस में,

खिड़की के उस पार से लगातार इशारे कर रही है

सुबह की यह गुलाबी ठंड।

— रत्नमय त्रिपाठी

अध्ययन, बलांगीर


Original Odia : Ratnamaya Tripathy

Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy


Want to read this poem in Odia ? Click Here

Want to read this poem in English ? Click Here

ରତ୍ନମୟ ତ୍ରିପାଠୀ

ତ୍ରସ୍ତ ହୃଦୟ ନ୍ୟସ୍ତ କାହାପାଖେ, ଗସ୍ତ ମୋ ବନସ୍ତରେ l ଅନ୍ତ ନାହିଁ ଏବେ ଅନନ୍ତ ଆକାଶେ, ବ୍ୟସ୍ତ ମୁଁ ଉଡିବାରେ ll

Leave a Reply