यह जान लो—मुझ पर उठाए गए तुम्हारे इस हाथ के बदले,
मैं पलटकर बद्दुआ (श्राप) का हाथ नहीं उठा सकता।
आज जो तुमने मुझ पर हाथ उठाया है,
तो शायद तुम यह भूल रहे हो कि
यह हाथ, इस हाथ की नसें और इसमें बहने वाला लहू का एक-एक कतरा भी
मेरा ही है।
मेरे हाथों के साए में,
मेरी हथेलियों के स्पर्श और मेरी गाँठ-गाँठ के छाले होने के बदले—
गढ़े गए हैं तुम्हारे ये हाथ और तुम्हारे अंग-प्रत्यंग।
पीठ पर किसका थाप पाकर (किसकी शह पर)
इतनी धृष्टता (अहंकार) दिखा रहे हो, मेरे बच्चे (धन)?
शायद तुम्हें मालूम नहीं है—
यहाँ दाहिने हाथ के ज़ख्म पर मरहम लगाने के लिए,
बायाँ हाथ भी नफ़रत से मुँह मोड़ लेता है।
जो हाथ कभी सिर्फ़ पैर की धूल छूने (चरण-स्पर्श) के योग्य थे—
उन हाथों से आज मुझ पर हुकूमत करने की
कोशिश मत करो।
साँस की यह डोर टूट जाने के बाद,
मेरी अर्थी को कंधा देने के लिए भी
तुम्हारे ये हाथ तरस जाएँगे।
बह गए पानी और कह दी गई बात की तरह,
एक बार उठाया गया हाथ कभी वापस लौटाया नहीं जा सकता।
शरीर के बाहरी निशान तो तुम शायद मिटा भी लोगे,
पर इस सीने के भीतर लगे गहरे ज़ख्मों को
भला कैसे भर पाओगे?
चूँकि तुमने कभी किसी पहाड़ को टूटते नहीं देखा,
इसीलिए इन कोमल हाथों के भरोसे पत्थर चीरने निकले हो।
एक बार इस सख्त चट्टान को तोड़कर तो देखो,
तुम्हें एक मज़बूत और तपे हुए हाथ की अहमियत समझ आ जाएगी।
जिस आसमान की छत के नीचे
तुम मिट्टी को चीरकर ऊपर की ओर बढ़े,
जब उसी सिर के ऊपर से वो साया (हाथ) हट जाएगा,
तब ऐसा बेखौफ आशियाना (छत)
तुम कहाँ से पाओगे?
किसी पर हाथ उठा देना
कोई बड़ी बात नहीं होती मेरे बच्चे;
सबका हाथ थामकर जब राह चलना सीख जाओगे,
तभी तुम सही मायनों में इंसान कहलाओगे।
— रत्नमय त्रिपाठी
अध्ययन, बलांगीर
Original Odia : Ratnamaya Tripathy
Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy
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