मानसून को साक्षी रखकर

मानसून को साक्षी रखकर, अब मैंने आज़ादी दे दी है। सारे मान-अभिमान (शिकवों) को भीतर दबाकर, युगों-युगों की प्रतीक्षा के बंधन को मैंने खोल दिया है। अब मैं बादलों से कभी नहीं पूछूँगा तुम्हारे आने में हुई इस देरी का कारण, और न ही मिट्टी की सोंधी महक से अब कभी यह मन मतवाला होगा। यदि तुम चाहो, तो बाँध लो (फैला लो) अपने तितली जैसे दोनों पंख। अब तुम्हारे लिए यह पूरा आसमान आज़ाद है; उड़ती रहो तब तक, जब तक कि तुम राह न भटक जाओ। अनिच्छा से ही सही, पर कभी यदि आसमान से तुम्हें मेरा यह आँगन दिखाई दे, तो एक बार आकर देख जाना इस तपस्वी का जीवन— कि प्रेम का ठिकाना ढूँढने की चाह में, मेरा यह वक़्त कैसे बीत रहा है। यदि तुम यह सोच रही हो कि यह मेरा कोई झूठा अभिमान (रूठना) है, तो आकर मुझसे यह वचन (कसम) ले जाओ— कि ऐसे ही बीतेगी मेरी यह पूरी एकाकी (तन्हा) ज़िंदगी। — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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हे चंचल नयनों वाली सुंदर चंद्रमुखी…

हे चंचल आँखों वाली सुंदर चंद्रमुखी सुंदरी! तुम्हारी वाणी चातुर्य, चपलता और मोहक छलावे से भरी है। एक चतुर स्त्री की तरह एक चंचल, तरंगित मन लेकर, तुम राहों के अनगिनत रंगों को गिनती हुई चलती जाती हो। चंपा के फूलों को चुनते समय तुम्हारे चंद्रमा जैसे मुखड़े पर जब अद्भुत चमक बिखरती है, तब चपल भँवरें अपने पूरे दल-बल (फ़ौज) के साथ, सहसा चौंककर डर के मारे भाग खड़े होते हैं। तुम्हारी घुँघराली अलकें (लटें) जब तुम्हारी ठोड़ी को चूमती हैं, तब सुंदर भृकुटी (भौंहों) से सजा तुम्हारा मुख किसी चित्र सा प्रतीत होता है। चीन के रेशम (चीनांशुक) से बने महीन वस्त्र धारण किए हुए, तुम्हारा यह पूरा रूप चंदन के लेप से सुवासित है। चार मुख वाले ब्रह्मा ने चारों युगों तक कठिन परिश्रम करके, बैठकर तुम्हारी इस अनुपम छवि को गढ़ा है। फिर ऐसी मायाविनी बनकर तुम भला इस चिर-कुमार (ब्रह्मचारी) को, अपने प्रेम के इस चक्रव्यूह (चक्रबंध) में बाँधने क्यों चली आती हो? — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Ratnamaya Tripathy now presents a poem showcasing "Cha-Anuprasa" (Alliteration of the letter 'Cha' / ଚ-ଅନୁପ୍ରାସ). Every single word in this verse begins with the letter "Cha" (ଚ), pulling from highly sophisticated, classical Odia vocabulary to describe the mesmerizing, almost divine beauty of a woman and the sweet entrapment of her love. Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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हादसा कर मुझे घायल करके…

हादसा कर (विपदा लाकर) मुझे घायल करने के बाद, अब तुम घाव पर मरहम लगाने (तटबंध बाँधने) आए हो। पसीने से लथपथ शरीर से तुम मिट्टी का घड़ा गढ़ रहे हो, एक साधारण कुम्हार का वेष धारण करके। पूरे सावन (वर्षा ऋतु) भर मेरे करीब न आकर, तुम सिर्फ अपनी दूरी और भारी घमंड दिखाते रहे। मन में घृणा का भाव लिए बार-बार आकर, तुमने ऐसा चक्रव्यूह रचा जिसने मेरा घर ही डुबो दिया। नदी के घाट पर तुम्हारे घुँघरुओं को ढूँढते हुए, आज इन गहरे ज़ख्मों की चोट से कराहते हुए, देखो मुझे—अपने बदन पर कपूर मलकर, मैं अपने ही घर में इस आघात को सह रहा हूँ। हे घने काले केशों वाली सुंदरी! हाथ में पानी का घड़ा थामे, तुम संकट हरने वाली 'घटकालिका' के रूप में आओ। इस घायल शरीर पर प्रेम का सघन रस उड़ेलकर, मेरे इन सारे दुखों और आघातों का नाश कर दो। — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Continuing his astonishing sequence of classical alliterative compositions (Anuprasa), Ratnamaya Tripathy now presents a poem featuring "Gha-Anuprasa" (Alliteration of the letter 'Gha' / ଘ-ଅନୁପ୍ରାସ). Every single word in this piece begins with the letter "Gha" (ଘ), utilizing heavy, classical Odia vocabulary to portray a dramatic story of betrayal, pain, and a plea for healing. Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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जूड़े में गजरा, गले में गेंदे की माला…

जूड़े में गजरा सजा है और गले में गेंदे की माला है, काया पर गेरुआ (भगवा) वस्त्र सुशोभित है। तुम्हारे गालों (कपोलों) पर गहरा तिलक लगा है, और तुम्हारी चाल अत्यंत गंभीर एवं राजसी है। गंधर्वों जैसी मधुर शैली में गायन करते हुए सुनाओ चैतन्य महाप्रभु (गौरांग) के गौरव की पवित्र वाणी। आकाशगंगा की धार को स्थानीय गँगुआ (नदी) में बहाते हुए, गंगा माता के प्रति भक्ति की पावन कहानी सुनाओ। कल बीते हुए दिन, खिड़की (झरोखा) खोलकर जब मैं बैठकर एक गीत लिख रहा था, तब आकाश की अप्सरा का रूप आँखों के सामने तैर गया, जो गजगामिनी (हाथी जैसी मस्त और गरिमामयी) चाल से चल रही थी। तुम हमारे ग्रामीण गढ़जातों (रियासतों) की सहेजी हुई पूँजी हो, तुम्हारा रूप सुगंध से भरी धरती जैसा मनमोहक है। हे चंद्रमा जैसे मुख वाली पवित्र गंडकी नदी जैसी सुंदरी, तुमने यह कौन सा अलौकिक वेष धारण किया है? — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy This is Ratnamaya Tripathy's another master piece. this time showcasing "Ga-Anuprasa" (Alliteration of the letter 'Ga' / ଗ-ଅନୁପ୍ରାସ). Every single word in this piece begins with the letter "Ga" (ଗ), weaving classical vocabulary to describe a divine, graceful woman adorned like a saintly devotee. Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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यह सोचकर कि तुम खबर फैलाकर खिसक जाओगे…

यह सोचकर कि तुम अफवाह (खबर) फैलाकर खिसक जाओगे, और एक ख़ुशी का खिलौना गढ़कर, मेरे दिल के टुकड़े कर मुझे ही गड्ढे में धकेलने में, तुमने बहुत सारा वक़्त और जतन खर्च किया है। आकाश-कुसुम (हवाई) जैसी बेबुनियाद खबर पर खफा होकर, तुमने सोचा कि मैं तुम्हारी कमियाँ नहीं ढूँढूँगा। पर एक उन्मादी प्रेत की तरह व्याकुल होकर भी, मैं तुम्हें क्षमा करने में कभी निष्ठुर या उतावला नहीं हुआ। अगर मैं एक छोटा सा जुगनू हूँ, तो तुम साक्षात् सूर्य हो! सारे गिले-शिकवे मिटाकर खिलखिलाकर हँस दो। हे खंजन जैसी आँखों वाली सुंदरी! अपनी पवित्र 'खंडुआ' (ओड़िआ रेशमी पोशाक) के वेष में, मेरे पास आओ और मेरे सारे दुखों को हर लो। — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy This Poem is another masterful showcase of classical stylistic composition of Ratnamaya Tripathy. This poem features "Kha-Anuprasa" (Alliteration of the letter 'Kha' / ଖ-ଅନୁପ୍ରାସ), where every single word begins with the letter "Kha" (ଖ). It utilizes rich, traditional Odia vocabulary to express a lover's playful plea and realization. Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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सिर्फ इसलिए कि तुमने कहा था…

प्रतीक्षा में बीता हुआ सारा समय सड़-गल कर कभी नष्ट नहीं हुआ। जनमदिन की मेज़ पर मोमबत्तियों की संख्या अपनी मर्ज़ी से नहीं बढ़ी थी। भँवरे ने जानबूझकर रास्ता नहीं भूला था, न ही ऋतुचक्र के बदलने से बदले थे बगीचे के फूल। ऐसी कविताएँ कभी यूँ उमड़कर डायरी के पन्नों पर नहीं उतरतीं; फरार (लापता) हो चुके शब्द कभी इस तरह बात नहीं मानते। यह हलाहल (विष) कभी इस तरह अमृत में नहीं बदलता। हरसिंगार (गंगाशिउली) की महक से गुलाब की कली कभी यूँ नहीं मुरझाई थी। दूर देश के पंछियों के लौट जाने के बाद भी, घोंसला कभी बिखरा हुआ नहीं था। चक्रव्यूह के भीतर से भी लौट आए थे अभिमन्यु। ययाति ने स्वेच्छा से मोह का त्याग कर लौटा दी थी उधार ली हुई जवानी। नदियाँ भले ही राह भटक कर सागर में न मिल पाई हों, पर सागर की प्रेममयी लहरें कभी कम नहीं हुईं। चोर-बालू (दलदल) पर बने कदमों के निशान मिट जाने के बाद भी, रास्ता साफ़ मालूम पड़ रहा था। देखो, सिर्फ इसलिए कि तुमने कहा था, बसंत ने भी अभी तक आँगन नहीं छोड़ा है। अगर वादे ही भुला दिए जाएँ, तो यहाँ कौन अपना (जाना-पहचाना) है और कौन पराया (अन्जान)? — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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प्रेम के रंग में भिगोऊँगा तुम्हें

अब तुम्हें सात रंग नहीं दूँगा, तुम्हारे लिए अब सिर्फ प्रेम का रंग बचाकर रखा है। पतझड़ से ठूंठ बने इस शरीर पर एक बार फिर हरी पत्तियाँ उग आई हैं। देखो!!! देखो कि अब मैं कैसे सदाबहार हूँ। बहुत दिनों से राह भटके उस भँवरे को मैं बगीचे में वापस बुला लाया हूँ। तुम्हारे इशारे पर वह मँडराएगा इस फूल से उस फूल तक। तुम्हारे स्वागत के लिए मैंने रखा है एक काँटों से रहित गुलाब। मोगरे (मल्लिक) के फूलों की महक से आँगन को महकाया है, और अभी-अभी बौर आए आम के घने पेड़ पर कोयल से कह दिया है— कि वह तुम्हारे लिए स्वागत-गीत गाए। गुलमोहर (कृष्णचूड़ा) के सारे पेड़ दिखेंगे और भी ज़्यादा रंगीन। इस बार जब तुम आओगे, तो मैं कतई नहीं कहूँगा कि मैं बहुत व्यस्त हूँ। तुम्हारे लिए कविताएँ लिखूँगा। अगर तुम चाहोगी, तो सम्मोहन (मोह लग्न) के कवि से माँगकर तुम्हें प्रेम के गीत सुनाऊँगा, रात-रात भर जागकर। तुम्हारे जागने के बाद ही सुबह होगी, और तुम्हारे सो जाने पर रात हो जाएगी। जो तुम चाहोगी वही होगा, मैं सब कुछ सहर्ष (सिर झुकाकर) स्वीकार करूँगा। फागुन के रंगों में तो कई बार भिगोया है तुम्हें, इस बार सिर्फ प्रेम के रंग में भिगोऊँगा तुम्हें। सर्दियाँ बीत चुकी हैं और बसंत का आगमन हो चुका है, पतझड़ की तरह हमारा मन और हमारी उम्र न झड़े। चाहो तो इस बेला में आकर परोस देना प्रेम का पीयूष (अमृत)... परोस देना प्रेम का पीयूष। — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya…

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अभी-अभी, पंचतत्व में

अभी-अभी, पंचतत्व में लीन हो गया एक शरीर। उस देह के साथ ही जलकर खाक हो गए उसके जीवन के सारे दुःख, मान-अभिमान (नाराज़गी), और उसके भीतर सहेजी हुई पुराणों की गाथाएँ। दूर से ही दिखने वाली वह ख़ुशी की मुस्कान, और मेरे सिर पर टिका वह स्नेह का हाथ—सब विलीन हो गया। "मौसी" की वह पुकार हमेशा-हमेशा के लिए ज़ुबान से कहीं खो गई। पुराणों के किसी प्रसंग को याद दिलाने के लिए, अब उससे कोई लाड़-मनुहार नहीं की जा सकेगी। उसके घर के पास वाली राह से गुज़रते हुए अगर मैं रास्ता बदलकर (कतराकर) निकल भी जाऊँ, तो अब कोई मुझे टोकने या डाँटने वाला नहीं है। संसार के समस्त सम्मानों से परे, मैं तुम्हें कहाँ स्थान दूँ, मौसी...? तुम्हारी याद में मैंने जो दीया जलाया है, उसी में अपनी श्रद्धा और सम्मान का अर्घ्य अर्पित करूँगा। — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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वही तो सच्चे मित्र हैं…

सूखती हुई नदी में, एक उपनदी बनकर उसे सदावाहिनी (चिरस्रोता) बनाए रखने की कामना रखने वाले; ढीली पड़ती हुई हाथ की मुट्ठी को और अधिक मज़बूत करने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाने वाले; सारे झूठ को ढँककर (परास्त कर), सत्य का सामना करने के लिए भीतर साहस जगाने वाले; चट्टान को चीरकर ऊपर उठने के संघर्ष में, जो जड़ और खाद... दोनों बन जाते हैं; ऐसे सभी श्रेष्ठ चरित्र वाले इंसान ही... सच्चे मित्र होते हैं। — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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एक शीतकालीन सुबह की कविता

ऐसा बगीचा मैंने पहले कभी नहीं देखा था, नहीं देखे थे कभी इतने फूल और भँवरे। पेड़ों की ओट में छिपा हुआ यौवन, सीमेंट के चबूतरों पर सुस्ताता हुआ बुढ़ापा, घास के कलीचे पर खेलता हुआ भविष्य, और पगडंडी (वॉक-वे) पर— कुछ अस्वस्थ शरीरों को सुधारने के प्रयास में जुटा यह समय। फ़व्वारे से गिरता हुआ पानी सुबह की धूप में इंद्रधनुष गढ़ रहा था। घास पर बिखरी ओस की बूंदें मोतियों का भ्रम पैदा कर रही थीं, पर बेंच पर खिले हुए वे फूल कोई भ्रम नहीं थे, वे बेहद ताज़ा और सच्चे लग रहे थे। रात भर की सारी थकान को कंबल के भीतर ही छोड़ कर, वह अपने ऊनी कपड़ों में सुबह की उस धूप को समेट रही थी। होठों का रंग अभी फीका नहीं पड़ा था, आँखों से काजल अभी छूटा नहीं था। ढलते हुए घूंघट को संभालते हुए, वह अपनी पायल ठीक कर रही थी। धीमी पड़ गई थीं उसकी राहें, लजा गई थीं उसकी आँखें। चलते-चलते थक चुके उस पसीने से तरबतर शरीर को जैसे ही उसने सीधा किया… तभी कुकर की सीटी से नींद टूट गई! रसोईघर से आवाज़ आ रही थी— "आज वॉक (सैर) पर नहीं जाओगे क्या...? बहुत देर हो रही है!" — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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