कल्पनालोक में कवि
क्योंकि मैं किसी को बता नहीं पाया अपने उस कल्पनालोक की बातें, मेरी वे तमाम कल्पित बुराइयाँ और पाप अब कल्पना बनकर मेरे मस्तिष्क को घुमाते हैं। कामरूप (जादू) के मंत्र और इस काया की माया में, उस सुंदर और घने उपवन में विचरते हुए, मनचाही कामिनी के नयनों के बाण की चोट से, मैं कामना की अग्नि में जलता चला जाता हूँ। कुख्याति, कुतर्क और कुत्सित (कड़वी) बातों को, कुंद (सफेद चमेली) की सुगंध में घोलकर, तुम उस सरोवर की कुमुदिनी बन गईं, जिसने एक कुशल जादूगरनी (मायावी) का स्वांग रचा। सुबह की उस कल्याणमयी और ताज़ा ओस में, तुम श्वेत कमल (कल्हार) की एक कली हो। हे कल-कल बहती नदी (कल्लोलिनी)! अपनी तरंगों की धार के साथ, तुम आईं और मुझे कीर्ति (यश) से सराबोर कर गईं। — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy This specific poem by Ratnamaya Tripathy is a brilliant stylistic showcase of "Ka-Anuprasa" (Alliteration of the letter 'K' / କ-ଅନୁପ୍ରାସ). In traditional Odia poetry (like Upendra Bhanja's Baidehisa Bilasa), writing verses where every single word begins with the same letter is a highly revered classical feat. Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here
