हृदय के ईश्वर (हृदय ईश्वर)

सोच रहा हूँ इस बार, मौन के बंधन में छटपटाते हुए कुछ शब्दों को आज़ादी दे दूँगा। कुछ स्मृतियों और अनुभवों को पिंजरे से निकालकर बाहर का रास्ता दिखा दूँगा। बहुत दिनों से जो एक अधूरी प्रतीक्षा थी, उसे अब कविता का रूप नहीं दूँगा। हृदय में सहेजकर रखे हुए प्रेम को, अब राहों में बिखेर (बाँट) दूँगा। जाने-पहचाने चेहरों को जानबूझकर, अब अनजाना समझूँगा। फ़ोन में सहेजे (Save) गए सारे नंबर, अब डिलीट कर दूँगा। तुम्हारी उस चुनौती का कोई प्रतिउत्तर, मैं अब देना नहीं चाहता। तुम जानते हो कि मैं जीतूँ या न जीतूँ, पर तुम्हें कभी हारने नहीं दूँगा। तुम्हारे अभिमान (रूठने) के श्राप से, अब मैं घाट का एक पत्थर बन चुका हूँ। चाहो तो इस पर अपने पाँव पखार (धो) लो, या फिर इसे ले जाकर अपने हृदय का ईश्वर गढ़ लो। — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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समय की प्रतीक्षा में…

श्रावण की वर्षा से भीगी हुई मिट्टी में बो दो स्मृतियों के सारे बीज। वे अंकुरित हों या न हों, आशा और विश्वास की खाद देकर नोच लो निराशा की अनचाही, जंगली घास को। प्रतीक्षा करो… प्रतीक्षा करो… परंतु, 'अमृत काल' में रोपे गए पेड़ पर अमृत ही फलेगा— यह अंधविश्वास मत रखना। दूर क्षितिज पर दिखते हुए इंद्रधनुष से चुन लो वह रंग जो तुम्हें रास आए। उस रंग को लेकर राजनीति करो, ईश्वर को गढ़ो, या फिर खुद ही ईश्वर के दूत बन जाओ! एक नया इतिहास रचा जा चुका है, अब अपना मुंह बंद रखो और उसका समर्थन करो। राजमार्ग पर खड़े होकर घोषणा करो अपनी जाति की, अपने इतिहास की और अपनी जन्मभूमि की! नदी के कछार पर खिले काश-फूलों (काशतंडी) की ओट में मत छुपाओ अपनी इस कलंकित देह को। पारिजात के रंगों में भीगे अपने इस मन को किस नदी के पानी में धोओगे? किस घाट पर नहाकर पवित्र करोगे अपनी आत्मा को? किस पहाड़ की चोटी पर जाकर घोषणा करोगे अपनी राष्ट्रीयता की? प्रतीक्षा करो… बोए हुए स्मृतियों के वे सारे बीज चट्टान को चीरकर ऊपर उठेंगे। सफलता की फसल बटोरकर, यह जाति, यह देश फिर से मुस्कुराएगा। —————– — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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अब खामोशी का मौसम है

अब, फिर से कुछ समय के लिए मौन (खामोश) रहना होगा। पानी के भीतर फेंके गए एक छोटे से कंकड़ की तरंगों से जो सुनामी उठी है, अब उसका सामना करना होगा। कौन जानता था कि बहते पानी में तैर कर आए एक केकड़े के डंक से, यूं ही मिट जाएगा एक पुराना और गहरा रिश्ता! अब कोई नया रिश्ता बनाए बिना, बस मौन रहना होगा। कभी-कभी आईना भी झूठ बोल जाता है, और अपनी ही परछाई भूल कर बैठती है ज़िंदगी के सारे गणित में। कौन जानता था कि नए रोपे गए पेड़ इतनी जल्दी विषैले फल देंगे! अब इस सारे हलाहल (ज़हर) को पीकर, नीलकंठ बनना होगा। राह भटके मुसाफिर को रास्ता मत दिखाओ, भूखे को एक बूंद मांड (तोराणी) भी मत दो। क्या पता, सहायता के लिए बढ़ाए गए उसी हाथ में, लोहे की ज़ंजीरें बांधनी पड़ जाएं! झूठ और सच के इस चौसर के खेल में, झूठ जीत जाता है। सच को सच कहने का मौका तक नहीं मिलता। समय की टिक-टिक करती आवाज़ को खुद में सोखकर, अब बहुत दिनों तक, मौन रहना होगा... —————– — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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अभी कुछ शब्द कहने बाकी हैं

अभी कुछ शब्द कहने बाकी हैं, अभी कुछ शब्द सुनने बाकी हैं। पूरे करने बाकी हैं कुछ वादे, चुकाने बाकी हैं कुछ ऋण। कुछ अनाम कविताओं को अभी शीर्षक देना बाकी है, शब्दों के कुछ पेड़ों को अभी यत्न से बड़ा करना बाकी है। जो लोग बिना कुछ कहे चले गए, उनकी स्मृति में अभी मौन रहना बाकी है। लेन-देन के इस संसार से जाते समय जो आत्माएं कुछ साथ नहीं ले गईं, उनसे उनकी अर्जित धन के मालिकाना हक के बारे में पूछना बाकी है। बाकी है अभी बही-खाते का हिसाब, बाकी है अभी देव-ऋण का हिसाब, बाकी है अभी देशभक्ति का हिसाब। उम्र की उन अनगिनत, रातों की बेकरारी और अनकहे लम्हों को, सुबह होने से पहले, किनारे तक पहुँचाना बाकी है। लगाए हुए कृष्णचूड़ा (गुलमोहर) के पेड़ पर अब फूल नहीं आते, सारे पत्ते झाड़ चुके उस बगीचे में एक बार फिर, पानी सींचना बाकी है। मिट्टी से आसमान की दूरी को मापते-मापते, जितनी भी उम्र थी, वह अब समाप्त हो चुकी है। क्षितिज को देखने के बाद, अब खुद पर ही एक आत्म-व्यंग्य की हंसी हंसना बाकी है। अभी-अभी ऊपर की ओर उठे हुए हाथ को सीधा कर, अपने प्रिय शहर के सीने से अपना नाम मिटाकर, बस एक अंतिम शब्द कहना बाकी है... "विदा।" —————– — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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तुम्हारे सिखाए हुए शब्द

तुम्हारे सिखाए हुए वे शब्द, जब से निशब्द (मौन) हो गए हैं, इस रुलाई और आंसुओं के बीच, सांसारिक मोह भी टूट-टूट कर बिखर जाता है। समय के साथ उम्र की लकीरें तो बढ़ती हैं, पर यह मन कभी बड़ा (वयस्क) नहीं हो पाता। "माँ..." शब्द गले से बाहर निकल नहीं पाता, और सीने के भीतर बहुत तड़पाता है। इससे पहले कि बच्चे के हाथ इस काबिल हो सकें, ईश्वर अपने ही प्रतिरूप (माँ) को वापस छीन लेते हैं। बिना रंगों के, बिना किसी कैनवास के, एक छवि अंकित करनी पड़ती है यादों में। आँगन के तुलसी-चौंरे पर संझा की दीया तो जलती है, पर घर के भीतर जो दीया बुझ गया, उसका स्थान हमेशा के लिए सूना रह जाता है। रात के सपनों में बार-बार टूटती हुई नींद, मान-अभिमान के भंवर में घुटता हुआ यह मन, अपने दिल की बात किसी से न कह पाने वाले ये होठ, और तुम्हारी अनुपस्थिति के ३६५ दिन गिनती ये उंगलियां। कोई आएगा या नहीं आएगा... इन सब भावनाओं को, अब खुद ही संभालना पड़ता है। कोई न कोई आकर समझा ही जाता है कि— "जो होना था, वही हुआ है।" पर सब कुछ पढ़ने, सब कुछ सुनने और सब कुछ समझ लेने के बाद भी... वह एक शब्द, "माँ..." भीतर से बाहर आने का रास्ता ढूंढता ही रहता है। —————– — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English…

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आवरण

कुछ मुखर शब्दों को घूंघट (ओढ़नी) थमा दी गई, रात के अंधेरे में किए गए पाप-कर्मों पर परदा डाल दिया गया। सुबह की ढलती धूप में, और असमय आए इस तूफ़ान में, 'नई संभावनाओं' के सुनहरे सपने बेचे गए। रोज़ 'रुदाली' (मातम) गाने वाले होठों को आदेश दिया गया— कि अब मांगलिक गीत गाओ। एक पूरे क्षेत्र की जीवन रेखा के भीतर जान गंवाने वाले उन मूक गवाहों के लिए, जमीन के पट्टे और वृक्षारोपण का दिखावा कर अश्रुपूरित श्रद्धांजलि का नाटक किया गया। प्रधानमंत्री सड़क पर सरपट दौड़ती धूल उड़ाती गाड़ियों के भीतर के दर्द को छुपाकर, साल के दस हजार रुपयों की खैरात का 'हंसता हुआ मुखौटा' परोस दिया गया। ईंट-भट्ठे में अपनी जवानी खोने वाली वह कुंवारी लड़की, स्कूल से लौटते वक्त रास्ते से गायब हो गई वह तरुणी, कन्याश्रम (हॉस्टल) में जबरन मातृत्व को झेलती वह किशोरी, और भरी सड़क पर निर्वस्त्र की गई वह बेबस नारी— इन सबकी चीखती हुई खबरों को अखबारों के पन्नों से गायब कर दिया गया। असमय की बारिश से प्यास बुझाता वह अंकुरित बीज, सांझ की दीया जलाकर, घूंघट संभालती और बुदबुदाते हुए ढोक लगाती वह कुलवधू, मंदिर के बजते घंट-घड़ियाल और आरती के स्वर से गूंजता हुआ वह ग्रामीण परिवेश, नदी के कछार से घिरता हुआ वह अंधेरा, और भूतिया रोशनी के साथ गूंजती सियार की वह भयावह हुआं-हुआं की आवाज़— सब कुछ धीरे-धीरे एक अजीब खामोशी में दफन हो रहा था। ये 'अवतारी पुरुष' (ढोंगी मसीहा) जहां भी गए, वहां पुराना इतिहास मिटाकर एक नया इतिहास लिख दिया…

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अभिमान

सब कुछ तो लौट आया है… एक बार फिर उस ठूंठ पेड़ पर कौंपलें फूट पड़ी हैं। बाड़ी के आम के पेड़ पर बौर आ गए हैं। मल्लिक (मोगरे) की महक से आँगन महक उठा है। फाल्से के सारे पेड़ लाल फूलों से भर गए हैं। अकेले उड़ते पक्षियों ने चुन लिए हैं अपने-अपने बसेरे। अब पार्क में खाली नहीं बचता एक भी बेंच। गुपचुप (गोलगप्पे) के ठेले के पास भारी भीड़ उमड़ती है। फूलों की दुकान पर नहीं बचता एक भी बासी फूल। अब पहले की तरह, गलत पते पर नहीं भटकती एक भी चिट्ठी। नए-नए खरीदे गए रेडियो पर रोज़ बजते हैं सदाबहार गीत। तुम्हारे आने की राह को टकटकी लगाकर देखने वाले लोग, अब 'मनरेगा' के काम में व्यस्त हैं। खुसर-पुसर बातें करने वाली वे अनपढ़ औरतें, अवैध कब्जा हटाओ अभियान के कारण शहर से बाहर हो चुकी हैं। 'आज़ादी का अमृत महोत्सव' में, तिरंगी रोशनी के साथ जगमगा रहा है मेरा प्रिय शहर। विकास और विस्थापन दोनों एक साथ मिलकर खेलते हैं फागुन का अबीर। सब कुछ तो लौट आया है… समय के साथ कोई भी नहीं रूठा। तुम ऐसा कौन सा अभिमान (नाराज़गी) लेकर चले गए कि— गर्मी, बरसात और सर्दी बीत गई, बसंत भी लौट आया, पर तुम नहीं आए। — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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तुम्हारी पुण्य-यात्रा की अर्थी पर

तुम्हारी पुण्य-यात्रा की अर्थी पर, समर्पित हैं मेरे आंसू, भरा हुआ कंठ, और श्रद्धा के सुमन। किसी का ऋणी न रहने का तुम्हारा वह संकल्प, मुझे जन्म-जन्मों के लिए तुम्हारा ऋणी कर गया। लोग कहते हैं समय बीत जाने पर अभिनय समाप्त हो जाता है, "सब कुछ खत्म हो गया" के उस अंतिम संवाद के साथ— साहस टूट जाता है, और विश्वास भी दम तोड़ देता है, उस आखिरी सांस के साथ। सांत्वना के लिए बढ़े किसी और के हाथ में, वह आत्मीयता का भाव कहाँ होता है! पत्ते पर परोसा हुआ वह मुट्ठी भर भात ही बताता है, कि अब तुम हमारे बीच नहीं रहीं। क्या सब माताएं अपना बसेरा ऐसे ही छोड़ जाती हैं? बच्चों के पंखों में उड़ने की ताकत भरने के बाद, वे खुद उन्हें समंदर पार करते हुए नहीं देखतीं। सारे घर को सजाकर, सहेजकर, वे बटोरती रहती हैं अपने सारे कर्मफल। वे ओषा-व्रत और मन्नतें सब धरी रह जाती हैं, पूजा घर के ताक पर सजे हुए। अचानक, "माँ..." की वह पुकार दूर चली जाती है, श्मशान के करीब। अंतिम यात्रा की उस भीड़ में, जीवन भर के पुण्य-फल आंसू बनकर बह रहे होते हैं। —————– — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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ओम जय जगदीश हरे

ॐजयजगदीशहरे, स्वामीजयजगदीशहरे। भक्तजनोंकेसंकट, दासजनोंकेसंकट, क्षणमेंदूरकरे॥ ॥ॐ जय जगदीश हरे..॥ जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मनका, स्वामी दुःख बिनसे मनका। सुख सम्पति घर आवे, सुख सम्पति घर आवे, कष्टमिटे तनका॥ ॥ॐ जय जगदीश हरे..॥ मातपिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी, स्वामी शरण गहूं मैं किसकी। तुमबिन औरन दूजा, तुमबिन और न दूजा, आस करूंमैं जिसकी॥ ॥ॐ जय जगदीश हरे..॥

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देवी सूक्तम् (या देवी सर्वभूतेषु…)

नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः। नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम् ।।1।। रौद्रायै नमो नित्यायै गौर्यै धात्र्यै नमो नमः । ज्योत्स्नायै चेन्दुरुपिन्यै सुखायै सततं नमः ।।2।। कल्याण्यै प्रणतां वृद्ध्यै सिद्ध्यै कुर्मो नमो नमः । नैर्ऋत्यै भूभृतां लक्ष्म्यै शर्वाण्यै ते नमो नमः ।।3।। दुर्गायै दुर्गपारायै सारायै सर्वकारिण्यै । ख्यात्यै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नमः ।।4।।

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