बारिश और बस्ता
बारिश से भीगे उसके बदन में एक सौ चार डिग्री का तेज़ बुख़ार था, और उसके बस्ते (झोले) में दबा था आगे की पढ़ाई पर पूर्णविराम (डोर बँधने) का वह मौन संकेत। किसी ने भी यह समझने की कोशिश नहीं की कि वह आखिर क्यों भीगते हुए घर वापस लौटी थी। अचानक उमड़ कर आई इस मूसलाधार बारिश में…… वह भला कहाँ ढूँढती कोई एक सुरक्षित ठिकाना, जहाँ वह खुद को और अपने बस्ते को छुपा पाती? छुट्टी के बाद स्कूल का वह सूना बरामदा, रास्ते का वह ढाबा (कैंटीन), पान की दुकान, रवि का गैरेज, या फिर दीवार पर 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' लिखे होने वाला वह सरकारी प्रतीक्षालय— कहीं भी तो एक लड़की के लिए सुरक्षित छत नसीब नहीं थी, वह भला वहाँ कैसे रुक जाती? उसने अपनी स्कूल यूनिफॉर्म के भीतर तक धँसती देखी थीं पंद्रह से लेकर पचहत्तर साल तक की वे हवसी निगाहें। आशीर्वाद देने के बहाने बदन को टटोलने का मज़ा लेने वाले उन हाथों से— वह भला किस हक से आसरा (आश्रय) माँगती? उसने पास की चाय दुकान से आती सुनी थीं कुछ आधी-अधूरी, कान को चुभने वाली गंदी बातें। अपने बस्ते को सूखने की खातिर, वह भला अपने दिल और अपनी आत्मा को कैसे भीगने देती? उसकी सहेली ने एक दिन उससे कहा था— कि अगर मन के भीतर की बात को छुपाना सीख जाओ, तो बारिश होने पर किसी की भी छत के नीचे छुपा जा सकता है। पर क्योंकि वह अपने साथ हुई ज्यादती की बात छुपा नहीं पाई, इसीलिए…
