पंतोमाथ (PANTOMATH – सब कुछ जानने वाला)

अपने भाग्य और भविष्य की रेखाओं को खुद पूरी तरह पढ़ लेने के बाद भी, तुम इतनी ख़ुशी के साथ रह कैसे लेते हो...? अपने प्रियजनों से इतनी दूर रहकर भी, कैसे जोड़ लेते हो श्रद्धा और स्नेह के ये रिश्ते...? सामने पूरा का पूरा स्याह, अँधेरा रास्ता है, फिर भी कहाँ से पाते हो इतना साहस आगे बढ़ते जाने का...? राह भर खड़ी इन सवालिया आँखों के बीच भी, तुम कैसे तय कर लेते हो अपना सफ़र...? इन जाने-पहचाने चेहरों की भीड़ में, क्या तुम देख नहीं पाते उनकी वह उपहास और व्यंग्य भरी हँसी...? यहाँ उजाला आने पर खुद अपनी परछाई भी काया का साथ छोड़ देती है। दाहिने हाथ के ज़ख्म पर मरहम लगाने के लिए, बायाँ हाथ भी नफ़रत (घृणा) करने लगता है। शुभकामनाओं के इन मीठे संदेशों के भीतर छिपे आलोचना के उस हलाहल (ज़हर) को क्या तुम देख नहीं पा रहे हो...? अमृत का कलश देखकर, आँखें मूँदकर उसे पीने से ठीक पहले, एक बार चाणक्य के उस श्लोक को याद ज़रूर कर लेना! — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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तुम्हारे आँगन से दुखों के पेड़ उखाड़कर…

तुम्हारे आँगन से दुखों के सारे पेड़ उखाड़कर, जब मैंने उन्हें अपने आँगन में रोप दिया, तो देखो अब, उनमें कैसे खिल उठे हैं सुख के सुंदर फूल! अब तुम ही मुझसे कहो— क्या तुम इन फूलों को चुनने (बटोरने) आओगी, या फिर अपने आँगन से कुछ और दुखों के पेड़ लाकर मुझे तोहफे में दोगी...? उत्तर की प्रतीक्षा में....... तुम्हारा, मैं — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, यावर (बलांगीर) Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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स्वीकारोक्ति (इक़रारनामा)

देर रात तक मुझे ऑनलाइन देखकर यह मत सोच लेना कि तुम्हारी यादों में मेरी नींद उड़ गई है। मोबाइल डेटा बंद किए बिना सो जाना अब बस मेरी एक आदत सी बन गई है। जब तुम फ़ोन करती हो, तो नंबर व्यस्त (Busy) आता है क्या...? हाँ…… हर वक़्त काम में मसरूफ़ (व्यस्त) रहना अब मेरा कर्तव्य बन गया है। रोज़ अपने घर के सामने से मुझे आते-जाते देखकर यह मत समझ लेना कि तुम बालकनी में आकर दिख जाओ। तुम्हें देखने के लिए नहीं रे— उस पार का रास्ता बंद पड़ा है, इसलिए तुम्हारी घर वाली गली से गुज़रना अब मेरी मज़बूरी बन गया है। इतवार (रविवार) की सुबहें कभी सिर्फ़ तुम्हारे नाम हुआ करती थीं, पर अब हर दिन की सुबह सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरी होती है। प्रेम और विरह को लेकर कविताएँ लिखना अब बहुत पुरानी बात हो गई है। सुना है कि तुम फेसबुक पर मेरी कविताएँ पढ़ती हो...? हर कविता के भीतर भला तुम खुद को क्यों ढूँढती फिरती हो...? शायद तुम्हें इस बात का इल्म (पता) नहीं है— गहरे प्रेम में किसी को भी याद करना अब मेरे लिए पूरी तरह वर्जित हो चुका है। — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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खिड़की के उस पार की ठंड

अभी-अभी, घर के भीतर से बाहर निकल चुकी है यह ठंड— तन से, मन से और विचारों से। किसी के फ़ोन कॉल से अचानक टूटी हुई यह नींद एक गर्माहट भरी छुअन ढूँढती है। चाय के कप की खुशबू में, लिखी जा चुकी दिन की नई समय-सारणी (Routine) बिल्कुल अनूठी लगती है। मोबाइल के ये सारे संदेश अब उतना उत्साह नहीं जगाते। फिर भी, किसी के निश्चित बुलावें की आस में कदम आगे बढ़ तो जाते हैं… पर कमबख्त यह आलस अभी तक टूटता नहीं। "बहुत दिन हो गए तुम सैर (Walk) पर नहीं आए; इस ठंड से डर रहे हो… या अपने किए वादों से?" रात के वे हसीन सपने, वे आधी लिखी अधूरी कविताएँ, और बदन की वह गर्माहट इस कंबल के भीतर कितनी मासूम लगती हैं। पर बाहर, आँचल में सिमटी हुई वह धुंध, हथेलियों पर थमी ओस की बूंदें, और आँखों में ढलती सुबह की वह कोमल किरण— सब बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं। आधी रात तक चाव से पढ़ी गई उस सम्मोहन (मोह लग्न) की कविताओं की तरफ अब हाथ आगे नहीं बढ़ते। एक व्याकुल आलिंगन की आस में, खिड़की के उस पार से लगातार इशारे कर रही है सुबह की यह गुलाबी ठंड। — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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मानसून को साक्षी रखकर

मानसून को साक्षी रखकर, अब मैंने आज़ादी दे दी है। सारे मान-अभिमान (शिकवों) को भीतर दबाकर, युगों-युगों की प्रतीक्षा के बंधन को मैंने खोल दिया है। अब मैं बादलों से कभी नहीं पूछूँगा तुम्हारे आने में हुई इस देरी का कारण, और न ही मिट्टी की सोंधी महक से अब कभी यह मन मतवाला होगा। यदि तुम चाहो, तो बाँध लो (फैला लो) अपने तितली जैसे दोनों पंख। अब तुम्हारे लिए यह पूरा आसमान आज़ाद है; उड़ती रहो तब तक, जब तक कि तुम राह न भटक जाओ। अनिच्छा से ही सही, पर कभी यदि आसमान से तुम्हें मेरा यह आँगन दिखाई दे, तो एक बार आकर देख जाना इस तपस्वी का जीवन— कि प्रेम का ठिकाना ढूँढने की चाह में, मेरा यह वक़्त कैसे बीत रहा है। यदि तुम यह सोच रही हो कि यह मेरा कोई झूठा अभिमान (रूठना) है, तो आकर मुझसे यह वचन (कसम) ले जाओ— कि ऐसे ही बीतेगी मेरी यह पूरी एकाकी (तन्हा) ज़िंदगी। — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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बारिश… एक स्केच कविता

उसकी भीगी हुई आँचल (पड़त) से ममत्व (वात्सल्य) का झरना झर रहा था। पर अपने बीमार बच्चे के मुँह में निवाला देने के लिए, उसके स्तनों से दूध (अमृत) की धार सूख चुकी थी। 'काल बैसाखी' के तूफ़ान में उड़ गया जो छप्पर का एक हिस्सा, वह आज तक सुधारा नहीं जा सका; प्रशासन की ओर से मिलने वाली सहायता का वादा आज तक सिर्फ़ एक वादा ही बनकर रह गया है। ज़्यादा कमाने की आस में दलाल के साथ गया वह आदमी फिर कभी वापस नहीं लौटा। और वह तेरह साल की मासूम बेटी, जिसे सरपंच ने अपने घर यह कहकर बुलाया था कि वह उसे ओढ़ने के लिए एक पॉलिथीन की त्रिपाल देगा— वह बेटी उस दिन के बाद से आज तक घर नहीं आई। बारिश में ढहती हुई उस मिट्टी की दीवारों के भीतर से, छत की वे नंगी लकड़ियाँ (बल्लियाँ) बेहद बेबस दिख रही थीं। भरे यौवन में पूरी तरह टूट चुके एक मन को समेटे, वह अपने उन भीगे कपड़ों में ही किसी तरह बदन को ढँक रही थी। उसे रह-रहकर बचपन का वह गीत याद आ रहा था: "मेघ बरसे टुपूर-टापूर, केसूर (सिंघाड़े) में फूटे अंकुर, किस परदेस में रह गए मेरे राजा, जाओ, बजाओ ढोल और बाजा..." यहाँ अब उसे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। आँखों से लगातार आँसुओं की धार बह रही थी, और बाहर बादलों से बारिश की झड़ी लगी थी। बिजली की कड़क और बादलों की गड़गड़ाहट के बीच, रात के उस स्याह अँधेरे में विलीन हो रही…

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हे चंचल नयनों वाली सुंदर चंद्रमुखी…

हे चंचल आँखों वाली सुंदर चंद्रमुखी सुंदरी! तुम्हारी वाणी चातुर्य, चपलता और मोहक छलावे से भरी है। एक चतुर स्त्री की तरह एक चंचल, तरंगित मन लेकर, तुम राहों के अनगिनत रंगों को गिनती हुई चलती जाती हो। चंपा के फूलों को चुनते समय तुम्हारे चंद्रमा जैसे मुखड़े पर जब अद्भुत चमक बिखरती है, तब चपल भँवरें अपने पूरे दल-बल (फ़ौज) के साथ, सहसा चौंककर डर के मारे भाग खड़े होते हैं। तुम्हारी घुँघराली अलकें (लटें) जब तुम्हारी ठोड़ी को चूमती हैं, तब सुंदर भृकुटी (भौंहों) से सजा तुम्हारा मुख किसी चित्र सा प्रतीत होता है। चीन के रेशम (चीनांशुक) से बने महीन वस्त्र धारण किए हुए, तुम्हारा यह पूरा रूप चंदन के लेप से सुवासित है। चार मुख वाले ब्रह्मा ने चारों युगों तक कठिन परिश्रम करके, बैठकर तुम्हारी इस अनुपम छवि को गढ़ा है। फिर ऐसी मायाविनी बनकर तुम भला इस चिर-कुमार (ब्रह्मचारी) को, अपने प्रेम के इस चक्रव्यूह (चक्रबंध) में बाँधने क्यों चली आती हो? — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Ratnamaya Tripathy now presents a poem showcasing "Cha-Anuprasa" (Alliteration of the letter 'Cha' / ଚ-ଅନୁପ୍ରାସ). Every single word in this verse begins with the letter "Cha" (ଚ), pulling from highly sophisticated, classical Odia vocabulary to describe the mesmerizing, almost divine beauty of a woman and the sweet entrapment of her love. Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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हादसा कर मुझे घायल करके…

हादसा कर (विपदा लाकर) मुझे घायल करने के बाद, अब तुम घाव पर मरहम लगाने (तटबंध बाँधने) आए हो। पसीने से लथपथ शरीर से तुम मिट्टी का घड़ा गढ़ रहे हो, एक साधारण कुम्हार का वेष धारण करके। पूरे सावन (वर्षा ऋतु) भर मेरे करीब न आकर, तुम सिर्फ अपनी दूरी और भारी घमंड दिखाते रहे। मन में घृणा का भाव लिए बार-बार आकर, तुमने ऐसा चक्रव्यूह रचा जिसने मेरा घर ही डुबो दिया। नदी के घाट पर तुम्हारे घुँघरुओं को ढूँढते हुए, आज इन गहरे ज़ख्मों की चोट से कराहते हुए, देखो मुझे—अपने बदन पर कपूर मलकर, मैं अपने ही घर में इस आघात को सह रहा हूँ। हे घने काले केशों वाली सुंदरी! हाथ में पानी का घड़ा थामे, तुम संकट हरने वाली 'घटकालिका' के रूप में आओ। इस घायल शरीर पर प्रेम का सघन रस उड़ेलकर, मेरे इन सारे दुखों और आघातों का नाश कर दो। — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Continuing his astonishing sequence of classical alliterative compositions (Anuprasa), Ratnamaya Tripathy now presents a poem featuring "Gha-Anuprasa" (Alliteration of the letter 'Gha' / ଘ-ଅନୁପ୍ରାସ). Every single word in this piece begins with the letter "Gha" (ଘ), utilizing heavy, classical Odia vocabulary to portray a dramatic story of betrayal, pain, and a plea for healing. Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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जूड़े में गजरा, गले में गेंदे की माला…

जूड़े में गजरा सजा है और गले में गेंदे की माला है, काया पर गेरुआ (भगवा) वस्त्र सुशोभित है। तुम्हारे गालों (कपोलों) पर गहरा तिलक लगा है, और तुम्हारी चाल अत्यंत गंभीर एवं राजसी है। गंधर्वों जैसी मधुर शैली में गायन करते हुए सुनाओ चैतन्य महाप्रभु (गौरांग) के गौरव की पवित्र वाणी। आकाशगंगा की धार को स्थानीय गँगुआ (नदी) में बहाते हुए, गंगा माता के प्रति भक्ति की पावन कहानी सुनाओ। कल बीते हुए दिन, खिड़की (झरोखा) खोलकर जब मैं बैठकर एक गीत लिख रहा था, तब आकाश की अप्सरा का रूप आँखों के सामने तैर गया, जो गजगामिनी (हाथी जैसी मस्त और गरिमामयी) चाल से चल रही थी। तुम हमारे ग्रामीण गढ़जातों (रियासतों) की सहेजी हुई पूँजी हो, तुम्हारा रूप सुगंध से भरी धरती जैसा मनमोहक है। हे चंद्रमा जैसे मुख वाली पवित्र गंडकी नदी जैसी सुंदरी, तुमने यह कौन सा अलौकिक वेष धारण किया है? — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy This is Ratnamaya Tripathy's another master piece. this time showcasing "Ga-Anuprasa" (Alliteration of the letter 'Ga' / ଗ-ଅନୁପ୍ରାସ). Every single word in this piece begins with the letter "Ga" (ଗ), weaving classical vocabulary to describe a divine, graceful woman adorned like a saintly devotee. Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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यह सोचकर कि तुम खबर फैलाकर खिसक जाओगे…

यह सोचकर कि तुम अफवाह (खबर) फैलाकर खिसक जाओगे, और एक ख़ुशी का खिलौना गढ़कर, मेरे दिल के टुकड़े कर मुझे ही गड्ढे में धकेलने में, तुमने बहुत सारा वक़्त और जतन खर्च किया है। आकाश-कुसुम (हवाई) जैसी बेबुनियाद खबर पर खफा होकर, तुमने सोचा कि मैं तुम्हारी कमियाँ नहीं ढूँढूँगा। पर एक उन्मादी प्रेत की तरह व्याकुल होकर भी, मैं तुम्हें क्षमा करने में कभी निष्ठुर या उतावला नहीं हुआ। अगर मैं एक छोटा सा जुगनू हूँ, तो तुम साक्षात् सूर्य हो! सारे गिले-शिकवे मिटाकर खिलखिलाकर हँस दो। हे खंजन जैसी आँखों वाली सुंदरी! अपनी पवित्र 'खंडुआ' (ओड़िआ रेशमी पोशाक) के वेष में, मेरे पास आओ और मेरे सारे दुखों को हर लो। — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy This Poem is another masterful showcase of classical stylistic composition of Ratnamaya Tripathy. This poem features "Kha-Anuprasa" (Alliteration of the letter 'Kha' / ଖ-ଅନୁପ୍ରାସ), where every single word begins with the letter "Kha" (ଖ). It utilizes rich, traditional Odia vocabulary to express a lover's playful plea and realization. Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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