तुम्हारी इस लंबी ख़ामोशी में
देखो, तुम्हारी इस लंबी ख़ामोशी के दरमियान…… देखो कि पूरे शहर में कैसा कोहराम (शोर) मचा है। जो फैसला मैंने लिया था, जो कदम मैंने आगे बढ़ाए थे— वे गलत थे या सही, इसका न्याय करने का वक़्त ही कहाँ है……? इस शहर में बातों को हवा मिलने में देर नहीं लगती, और किसी की आवाज़ को दबाने में भी वक़्त नहीं लगता। फिर भी, मैं अडिग हूँ अपने उस फैसले पर। तुम्हारे ठुकराने का मुझे कोई मलाल (दुःख) नहीं है; दुःख तो बस इस बात का है कि मुझसे एक बड़ी चूक हो गई एक सच्चे दिल को पहचानने में। अब तो यह मिट्टी भी भीग चुकी होगी, भीग चुके होंगे ये वन और उपवन आषाढ़ की इस पहली बौछार में। पर मेरे दिल के इस उपवन में श्रावण की वह उजड़ी हुई बरसात लगी है, जो अब मुझे सिर्फ़ और सिर्फ़ यादों के बादलों में भिगोती रहती है। तुम जिसके लिए जला रही हो इस वक़्त साँझ का यह दीया— देखो…… वह रोशनी के लिए नहीं है रे, राह भटक कर कोई अपनी जान गँवा बैठता है ज़िंदगी को पा लेने की एक नादान आस में। किसी ने कभी कहा था कि ख़ामोशी मंज़ूरी की निशानी (सहमति का लक्षण) होती है। पर तुम्हारी इस लंबी ख़ामोशी की वजह से, आज मैं बदनाम हो गया हूँ इस पूरे शहर में। — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this…
