मानसून को साक्षी रखकर

मानसून को साक्षी रखकर,

अब मैंने आज़ादी दे दी है।

सारे मान-अभिमान (शिकवों) को भीतर दबाकर,

युगों-युगों की प्रतीक्षा के बंधन को मैंने खोल दिया है।

अब मैं बादलों से कभी नहीं पूछूँगा

तुम्हारे आने में हुई इस देरी का कारण,

और न ही मिट्टी की सोंधी महक से

अब कभी यह मन मतवाला होगा।

यदि तुम चाहो, तो बाँध लो (फैला लो) अपने

तितली जैसे दोनों पंख।

अब तुम्हारे लिए यह पूरा आसमान आज़ाद है;

उड़ती रहो तब तक, जब तक कि तुम राह न भटक जाओ।

अनिच्छा से ही सही, पर कभी यदि

आसमान से तुम्हें मेरा यह आँगन दिखाई दे,

तो एक बार आकर देख जाना

इस तपस्वी का जीवन—

कि प्रेम का ठिकाना ढूँढने की चाह में,

मेरा यह वक़्त कैसे बीत रहा है।

यदि तुम यह सोच रही हो

कि यह मेरा कोई झूठा अभिमान (रूठना) है,

तो आकर मुझसे यह वचन (कसम) ले जाओ—

कि ऐसे ही बीतेगी मेरी

यह पूरी एकाकी (तन्हा) ज़िंदगी।

— रत्नमय त्रिपाठी

अध्ययन, बलांगीर


Original Odia : Ratnamaya Tripathy

Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy

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ରତ୍ନମୟ ତ୍ରିପାଠୀ

ତ୍ରସ୍ତ ହୃଦୟ ନ୍ୟସ୍ତ କାହାପାଖେ, ଗସ୍ତ ମୋ ବନସ୍ତରେ l ଅନ୍ତ ନାହିଁ ଏବେ ଅନନ୍ତ ଆକାଶେ, ବ୍ୟସ୍ତ ମୁଁ ଉଡିବାରେ ll

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