अभी-अभी, पंचतत्व में

अभी-अभी, पंचतत्व में

लीन हो गया एक शरीर।

उस देह के साथ ही जलकर खाक हो गए

उसके जीवन के सारे दुःख,

मान-अभिमान (नाराज़गी),

और उसके भीतर सहेजी हुई पुराणों की गाथाएँ।

दूर से ही दिखने वाली वह ख़ुशी की मुस्कान,

और मेरे सिर पर टिका वह स्नेह का हाथ—सब विलीन हो गया।

“मौसी” की वह पुकार

हमेशा-हमेशा के लिए

ज़ुबान से कहीं खो गई।

पुराणों के किसी प्रसंग को

याद दिलाने के लिए, अब उससे कोई लाड़-मनुहार नहीं की जा सकेगी।

उसके घर के पास वाली राह से गुज़रते हुए

अगर मैं रास्ता बदलकर (कतराकर) निकल भी जाऊँ,

तो अब कोई मुझे टोकने या डाँटने वाला नहीं है।

संसार के समस्त सम्मानों से परे,

मैं तुम्हें कहाँ स्थान दूँ, मौसी…?

तुम्हारी याद में मैंने जो दीया जलाया है,

उसी में अपनी श्रद्धा और सम्मान का अर्घ्य अर्पित करूँगा।

— रत्नमय त्रिपाठी

अध्ययन, बलांगीर

—————–
Original Odia : Ratnamaya Tripathy

Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy

Want to read this poem in Odia ? Click Here

Want to read this poem in English ? Click Here

ରତ୍ନମୟ ତ୍ରିପାଠୀ

ତ୍ରସ୍ତ ହୃଦୟ ନ୍ୟସ୍ତ କାହାପାଖେ, ଗସ୍ତ ମୋ ବନସ୍ତରେ l ଅନ୍ତ ନାହିଁ ଏବେ ଅନନ୍ତ ଆକାଶେ, ବ୍ୟସ୍ତ ମୁଁ ଉଡିବାରେ ll

Leave a Reply