तुम्हारी पुण्य-यात्रा की अर्थी पर

तुम्हारी पुण्य-यात्रा की अर्थी पर,

समर्पित हैं मेरे आंसू, भरा हुआ कंठ,

और श्रद्धा के सुमन।

किसी का ऋणी न रहने का तुम्हारा वह संकल्प,

मुझे जन्म-जन्मों के लिए तुम्हारा ऋणी कर गया।

लोग कहते हैं समय बीत जाने पर अभिनय समाप्त हो जाता है,

“सब कुछ खत्म हो गया” के उस अंतिम संवाद के साथ—

साहस टूट जाता है, और विश्वास भी दम तोड़ देता है,

उस आखिरी सांस के साथ।

सांत्वना के लिए बढ़े किसी और के हाथ में,

वह आत्मीयता का भाव कहाँ होता है!

पत्ते पर परोसा हुआ वह मुट्ठी भर भात ही बताता है,

कि अब तुम हमारे बीच नहीं रहीं।

क्या सब माताएं अपना बसेरा ऐसे ही छोड़ जाती हैं?

बच्चों के पंखों में उड़ने की ताकत भरने के बाद,

वे खुद उन्हें समंदर पार करते हुए नहीं देखतीं।

सारे घर को सजाकर, सहेजकर,

वे बटोरती रहती हैं अपने सारे कर्मफल।

वे ओषा-व्रत और मन्नतें सब धरी रह जाती हैं,

पूजा घर के ताक पर सजे हुए।

अचानक, “माँ…” की वह पुकार दूर चली जाती है,

श्मशान के करीब।

अंतिम यात्रा की उस भीड़ में,

जीवन भर के पुण्य-फल आंसू बनकर बह रहे होते हैं।

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— रत्नमय त्रिपाठी

अध्ययन, बलांगीर

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Original Odia : Ratnamaya Tripathy

Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy

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ରତ୍ନମୟ ତ୍ରିପାଠୀ

ତ୍ରସ୍ତ ହୃଦୟ ନ୍ୟସ୍ତ କାହାପାଖେ, ଗସ୍ତ ମୋ ବନସ୍ତରେ l ଅନ୍ତ ନାହିଁ ଏବେ ଅନନ୍ତ ଆକାଶେ, ବ୍ୟସ୍ତ ମୁଁ ଉଡିବାରେ ll

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