तुम ही तो युगों-युगों से अवतार लेती हो
धरती के भारी बोझ का विनाश करने के लिए;
दीन-हीन, दुखी, दरिद्र, दलित और असहाय
कमज़ोर लोगों के टूटे हुए मनों में आशा का संचार करने के लिए।
विश्व आज चकित और आशंकित (भयभीत) है,
प्रतिशोध और प्रतिहिंसा की भावना चरम सीमा पर है।
सभ्यता के नाम पर असभ्य और बर्बर आचरण
सारी सीमाओं और सरहदों को लांघता जा रहा है,
और धीरे-धीरे प्रलय की आहट (पदध्वनि) सुनाई दे रही है।
आज असमय (संकट का काल) आन पड़ा है;
धरती माता दुखों के बोझ से दबी है और उनका मुख उदास है।
शरद ऋतु के आगमन के साथ लौट आओ, हे माँ!
हमारी थकान को हर लो और इन करोड़ों इंसानों के मन को शांत कर दो।
— रत्नमय त्रिपाठी
अध्ययन, बलांगीर
Original Odia : Ratnamaya Tripathy
Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy
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