जूड़े में गजरा सजा है और गले में गेंदे की माला है,
काया पर गेरुआ (भगवा) वस्त्र सुशोभित है।
तुम्हारे गालों (कपोलों) पर गहरा तिलक लगा है,
और तुम्हारी चाल अत्यंत गंभीर एवं राजसी है।
गंधर्वों जैसी मधुर शैली में गायन करते हुए सुनाओ
चैतन्य महाप्रभु (गौरांग) के गौरव की पवित्र वाणी।
आकाशगंगा की धार को स्थानीय गँगुआ (नदी) में बहाते हुए,
गंगा माता के प्रति भक्ति की पावन कहानी सुनाओ।
कल बीते हुए दिन, खिड़की (झरोखा) खोलकर जब मैं
बैठकर एक गीत लिख रहा था,
तब आकाश की अप्सरा का रूप आँखों के सामने तैर गया,
जो गजगामिनी (हाथी जैसी मस्त और गरिमामयी) चाल से चल रही थी।
तुम हमारे ग्रामीण गढ़जातों (रियासतों) की सहेजी हुई पूँजी हो,
तुम्हारा रूप सुगंध से भरी धरती जैसा मनमोहक है।
हे चंद्रमा जैसे मुख वाली पवित्र गंडकी नदी जैसी सुंदरी,
तुमने यह कौन सा अलौकिक वेष धारण किया है?
— रत्नमय त्रिपाठी
अध्ययन, बलांगीर
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Original Odia : Ratnamaya Tripathy
Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy
This is Ratnamaya Tripathy’s another master piece. this time showcasing “Ga-Anuprasa” (Alliteration of the letter ‘Ga’ / ଗ-ଅନୁପ୍ରାସ). Every single word in this piece begins with the letter “Ga” (ଗ), weaving classical vocabulary to describe a divine, graceful woman adorned like a saintly devotee.
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