कल्पनालोक में कवि

क्योंकि मैं किसी को बता नहीं पाया अपने उस कल्पनालोक की बातें, मेरी वे तमाम कल्पित बुराइयाँ और पाप अब कल्पना बनकर मेरे मस्तिष्क को घुमाते हैं। कामरूप (जादू) के मंत्र और इस काया की माया में, उस सुंदर और घने उपवन में विचरते हुए, मनचाही कामिनी के नयनों के बाण की चोट से, मैं कामना की अग्नि में जलता चला जाता हूँ। कुख्याति, कुतर्क और कुत्सित (कड़वी) बातों को, कुंद (सफेद चमेली) की सुगंध में घोलकर, तुम उस सरोवर की कुमुदिनी बन गईं, जिसने एक कुशल जादूगरनी (मायावी) का स्वांग रचा। सुबह की उस कल्याणमयी और ताज़ा ओस में, तुम श्वेत कमल (कल्हार) की एक कली हो। हे कल-कल बहती नदी (कल्लोलिनी)! अपनी तरंगों की धार के साथ, तुम आईं और मुझे कीर्ति (यश) से सराबोर कर गईं। — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy This specific poem by Ratnamaya Tripathy is a brilliant stylistic showcase of "Ka-Anuprasa" (Alliteration of the letter 'K' / କ-ଅନୁପ୍ରାସ). In traditional Odia poetry (like Upendra Bhanja's Baidehisa Bilasa), writing verses where every single word begins with the same letter is a highly revered classical feat. Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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सिर्फ इसलिए कि तुमने कहा था…

प्रतीक्षा में बीता हुआ सारा समय सड़-गल कर कभी नष्ट नहीं हुआ। जनमदिन की मेज़ पर मोमबत्तियों की संख्या अपनी मर्ज़ी से नहीं बढ़ी थी। भँवरे ने जानबूझकर रास्ता नहीं भूला था, न ही ऋतुचक्र के बदलने से बदले थे बगीचे के फूल। ऐसी कविताएँ कभी यूँ उमड़कर डायरी के पन्नों पर नहीं उतरतीं; फरार (लापता) हो चुके शब्द कभी इस तरह बात नहीं मानते। यह हलाहल (विष) कभी इस तरह अमृत में नहीं बदलता। हरसिंगार (गंगाशिउली) की महक से गुलाब की कली कभी यूँ नहीं मुरझाई थी। दूर देश के पंछियों के लौट जाने के बाद भी, घोंसला कभी बिखरा हुआ नहीं था। चक्रव्यूह के भीतर से भी लौट आए थे अभिमन्यु। ययाति ने स्वेच्छा से मोह का त्याग कर लौटा दी थी उधार ली हुई जवानी। नदियाँ भले ही राह भटक कर सागर में न मिल पाई हों, पर सागर की प्रेममयी लहरें कभी कम नहीं हुईं। चोर-बालू (दलदल) पर बने कदमों के निशान मिट जाने के बाद भी, रास्ता साफ़ मालूम पड़ रहा था। देखो, सिर्फ इसलिए कि तुमने कहा था, बसंत ने भी अभी तक आँगन नहीं छोड़ा है। अगर वादे ही भुला दिए जाएँ, तो यहाँ कौन अपना (जाना-पहचाना) है और कौन पराया (अन्जान)? — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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प्रेम के रंग में भिगोऊँगा तुम्हें

अब तुम्हें सात रंग नहीं दूँगा, तुम्हारे लिए अब सिर्फ प्रेम का रंग बचाकर रखा है। पतझड़ से ठूंठ बने इस शरीर पर एक बार फिर हरी पत्तियाँ उग आई हैं। देखो!!! देखो कि अब मैं कैसे सदाबहार हूँ। बहुत दिनों से राह भटके उस भँवरे को मैं बगीचे में वापस बुला लाया हूँ। तुम्हारे इशारे पर वह मँडराएगा इस फूल से उस फूल तक। तुम्हारे स्वागत के लिए मैंने रखा है एक काँटों से रहित गुलाब। मोगरे (मल्लिक) के फूलों की महक से आँगन को महकाया है, और अभी-अभी बौर आए आम के घने पेड़ पर कोयल से कह दिया है— कि वह तुम्हारे लिए स्वागत-गीत गाए। गुलमोहर (कृष्णचूड़ा) के सारे पेड़ दिखेंगे और भी ज़्यादा रंगीन। इस बार जब तुम आओगे, तो मैं कतई नहीं कहूँगा कि मैं बहुत व्यस्त हूँ। तुम्हारे लिए कविताएँ लिखूँगा। अगर तुम चाहोगी, तो सम्मोहन (मोह लग्न) के कवि से माँगकर तुम्हें प्रेम के गीत सुनाऊँगा, रात-रात भर जागकर। तुम्हारे जागने के बाद ही सुबह होगी, और तुम्हारे सो जाने पर रात हो जाएगी। जो तुम चाहोगी वही होगा, मैं सब कुछ सहर्ष (सिर झुकाकर) स्वीकार करूँगा। फागुन के रंगों में तो कई बार भिगोया है तुम्हें, इस बार सिर्फ प्रेम के रंग में भिगोऊँगा तुम्हें। सर्दियाँ बीत चुकी हैं और बसंत का आगमन हो चुका है, पतझड़ की तरह हमारा मन और हमारी उम्र न झड़े। चाहो तो इस बेला में आकर परोस देना प्रेम का पीयूष (अमृत)... परोस देना प्रेम का पीयूष। — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya…

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सपनों का महल

एक अलसाई सुबह में यह मनमौजी हवा मन को अनमना (व्याकुल) कर देती है। असमय किए गए आने के सारे वादे दिल को और अशांत कर देते हैं। यहाँ पूरे आँगन में भारी अफ़सोस पसरा है; अगर तुम आओगे भी, तो कौन सी उम्मीद लेकर आओगे? बिना किसी वजह के आकर भला फिर से अपवाद (कलंक/लांछन) क्यों सुनोगे? देखो…… मेरे पूरे बदन पर लगे हैं दंश (अपनों के डंक) के निशान। यह निष्ठुर भाग्य केवल दुःख देकर चला जाता है। दूर का कोई पंछी भी दूर से आकर यहाँ अपनी दिशा नहीं भटकता। दिन के उजाले में मेरी दशा तो देखो— कितनी जटिल और दयनीय है। फागुन में तुमने कहा था कि रंगों से खेलेंगे, सात रंगों के सपनों का एक महल (सौध) गढ़ेंगे। पर सिर्फ वादों की हथेली पर कभी घर नहीं बनता; प्रेम का आशियाना बनाने के लिए तो हाथ से हाथ का मिलना ज़रूरी होता है। — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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अभी-अभी, पंचतत्व में

अभी-अभी, पंचतत्व में लीन हो गया एक शरीर। उस देह के साथ ही जलकर खाक हो गए उसके जीवन के सारे दुःख, मान-अभिमान (नाराज़गी), और उसके भीतर सहेजी हुई पुराणों की गाथाएँ। दूर से ही दिखने वाली वह ख़ुशी की मुस्कान, और मेरे सिर पर टिका वह स्नेह का हाथ—सब विलीन हो गया। "मौसी" की वह पुकार हमेशा-हमेशा के लिए ज़ुबान से कहीं खो गई। पुराणों के किसी प्रसंग को याद दिलाने के लिए, अब उससे कोई लाड़-मनुहार नहीं की जा सकेगी। उसके घर के पास वाली राह से गुज़रते हुए अगर मैं रास्ता बदलकर (कतराकर) निकल भी जाऊँ, तो अब कोई मुझे टोकने या डाँटने वाला नहीं है। संसार के समस्त सम्मानों से परे, मैं तुम्हें कहाँ स्थान दूँ, मौसी...? तुम्हारी याद में मैंने जो दीया जलाया है, उसी में अपनी श्रद्धा और सम्मान का अर्घ्य अर्पित करूँगा। — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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वही तो सच्चे मित्र हैं…

सूखती हुई नदी में, एक उपनदी बनकर उसे सदावाहिनी (चिरस्रोता) बनाए रखने की कामना रखने वाले; ढीली पड़ती हुई हाथ की मुट्ठी को और अधिक मज़बूत करने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाने वाले; सारे झूठ को ढँककर (परास्त कर), सत्य का सामना करने के लिए भीतर साहस जगाने वाले; चट्टान को चीरकर ऊपर उठने के संघर्ष में, जो जड़ और खाद... दोनों बन जाते हैं; ऐसे सभी श्रेष्ठ चरित्र वाले इंसान ही... सच्चे मित्र होते हैं। — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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लौटते हुए कदम (फेरि आशुथिबा पाद)

ऐसा गहरा अँधेरा जहाँ अपनी परछाई भी दिखाई न दे, अब बहुत आत्मीय (अपना सा) लगता है। सपने चले आते हैं, यह जाने बिना कि आज अमावस्या है या पूर्णिमा। छत पर बैठे कबूतर जब टुकड़े-टुकड़े अनाज चुगते हैं, तो एक धुंधली सी तस्वीर उकेर जाते हैं। वह तस्वीर कभी-कभी साफ़ दिखाई देती है, तो कभी जीवित होकर डराती है। वह सारे दफ़न रहस्यों को न बताने की शर्त रखती है। "देखो... मैं अभी आया" कहकर जो वादे गए थे, वे फिर कभी लौटकर नहीं आते। और जो लौटते भी हैं, वे रोज़मर्रा के झंझटों भरे रास्तों पर राह भटक कर भूल जाते हैं। ऋतुचक्र से बसंत को विदा करते समय, उसने एक मुट्ठी अबीर माँगा था। मैं दे न सका, बस इसीलिए यह फागुन आज तक रूठा हुआ है। अभी-अभी, ऊपर की सीढ़ी से नीचे की सीढ़ी की ओर लौट आए ये कदम पूछते हैं— वह तस्वीर किसकी है...? क्या रहस्य है उसका...? आगे की ओर बढ़ते हुए कदम अब धीरे-धीरे पीछे की ओर लौट रहे हैं। ये निरुत्तर (मौन) होंठ, इस असहाय काया के साथ, और वह मासूम परछाई, धीरे-धीरे उस अँधेरे में विलीन होती जा रही है। — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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एक शीतकालीन सुबह की कविता

ऐसा बगीचा मैंने पहले कभी नहीं देखा था, नहीं देखे थे कभी इतने फूल और भँवरे। पेड़ों की ओट में छिपा हुआ यौवन, सीमेंट के चबूतरों पर सुस्ताता हुआ बुढ़ापा, घास के कलीचे पर खेलता हुआ भविष्य, और पगडंडी (वॉक-वे) पर— कुछ अस्वस्थ शरीरों को सुधारने के प्रयास में जुटा यह समय। फ़व्वारे से गिरता हुआ पानी सुबह की धूप में इंद्रधनुष गढ़ रहा था। घास पर बिखरी ओस की बूंदें मोतियों का भ्रम पैदा कर रही थीं, पर बेंच पर खिले हुए वे फूल कोई भ्रम नहीं थे, वे बेहद ताज़ा और सच्चे लग रहे थे। रात भर की सारी थकान को कंबल के भीतर ही छोड़ कर, वह अपने ऊनी कपड़ों में सुबह की उस धूप को समेट रही थी। होठों का रंग अभी फीका नहीं पड़ा था, आँखों से काजल अभी छूटा नहीं था। ढलते हुए घूंघट को संभालते हुए, वह अपनी पायल ठीक कर रही थी। धीमी पड़ गई थीं उसकी राहें, लजा गई थीं उसकी आँखें। चलते-चलते थक चुके उस पसीने से तरबतर शरीर को जैसे ही उसने सीधा किया… तभी कुकर की सीटी से नींद टूट गई! रसोईघर से आवाज़ आ रही थी— "आज वॉक (सैर) पर नहीं जाओगे क्या...? बहुत देर हो रही है!" — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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एक डूबी हुई सभ्यता की कहानी

सैकड़ों विस्थापितों के इन मासूम चेहरों में से मैं किससे कहूँ कि वह सुनाए जलभराव (जलमग्न होने) की यह व्यथा? कौन बताएगा कि कैसे डूब गया— अपने गाँव का मंदिर, श्मशान और वह स्कूल की इमारत, बचपन में जहाँ 'डाही-मांकड़ी' (पेड़-बंदर का खेल) खेलते थे वह आम का बगीचा, बाप-दादा के ज़माने से भोग पाती आ रही ग्राम-देवी की कुटिया, भाइयों के बँटवारे में हिस्से में आई सहजन की बाड़ी, और जहाँ रोज़ "हे प्रभु! तू ही रक्षा कर, मैं तो मात्र एक साधारण जीव हूँ" गाया जाता था— उस 'भागवत टुंगी' (धार्मिक चौपाल) के डूबने की कहानी। कैसा लगा था छाती के भीतर जब काटा जा रहा था गाँव का वह बरगद का पेड़? जहाँ मन्नत का धागा बाँधकर सोलह मंगलवार का व्रत करने के बाद बड़ी बेटी विदा होकर ससुराल गई थी। चार बेटियों के बाद एक बेटे की चाह में, जिस मंदिर की सीढ़ियों पर रोज़ नंगे बदन लेटकर मन्नतें माँगी थीं, जब उस पर बुलडोज़र चला— तो कलेजे पर कैसी चोट लगी होगी? 'महुलझार' में प्रेमिका के साथ भीगी हुई पहली बारिश का वह अनुभव अब सिर्फ यादों में है, क्योंकि महुए के वे सारे पेड़ अब जल-कैदी (पानी में दफन) हैं। जब से होश सँभाला था, तब से हम सुनते आ रहे थे— इस गाँव में चौड़ी सड़क बनेगी, नहर के पानी से दो-फसली खेती होगी, खेत मुस्कुराएँगे, किसान मुस्कुराएगा, अब कभी किसी को 'दादन' (प्रवासी मज़दूर) बनकर बाहर नहीं जाना पड़ेगा, ईंट-भट्ठों में मज़दूरी नहीं करनी पड़ेगी, ठेकेदार (सरदार) की लाल आँखें (जुल्म) नहीं…

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उड़ान

मैं अपने ही भीतर सिमट गया, बसेरा छोड़कर उड़े सारे पक्षी अब लौट आए हैं। पक्षी के एक नन्हे बच्चे ने सुबह को टकटकी लगाकर देखा, दूर का पहाड़ और नज़दीक चला आया, और आत्मीयता का भाव और गहरा हो गया। आजकल मुझे अपना शहर बहुत अच्छा लगता है— विकास की राह पर बढ़ती ये सड़कें। विस्थापितों के लिए "सबके लिए घर, घर में नल, नल में जल" सुन-सुनकर मैं बहुत खुश हुआ। खुद को अपने ही भीतर ढूंढ पाना ही ज़िंदगी है। समय के साथ धीरे-धीरे जुड़ते हुए रिश्तों को सदा जोड़े रख पाना ही ज़िंदगी है। किसी को अपने सीने (दिल) में थोड़ी सी जगह देना ही आत्मीयता है, और किसी की आँखों से एक बूंद आँसू भी न बहने देना शायद यही प्रेम है। मैं प्रेम का कोई दूसरा अर्थ नहीं जानता, मैं नहीं जानता कि मैं किससे प्रेम करूँगा। मैं नहीं बता सकता प्रेमिका की आँखों का पता, मैं नहीं बता सकता कि क्यों नींद उड़ जाती है किसी के पायलों की झंकार से। मैं नहीं बता सकता कि कितनी आत्मीयता होती है प्रेमिका के गहरे आलिंगन में। मैं नहीं समझ पाता कि प्रेमिका की हँसी में मुक्ति है या बंधन, कामना है या सिर्फ एक छलावा। मैं तो बस चाहता हूँ कि मुक्ति का एक मार्ग हो, खुद जीकर दूसरों को भी जीने देने की एक सुंदर भावना हो। प्रेम हो या न हो, पर शुभकामनाओं का वह प्रेम-पक्षी मुक्त आकाश में सदा अपनी उड़ान भरता रहे। — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia :…

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