आवरण
कुछ मुखर शब्दों को घूंघट (ओढ़नी) थमा दी गई, रात के अंधेरे में किए गए पाप-कर्मों पर परदा डाल दिया गया। सुबह की ढलती धूप में, और असमय आए इस तूफ़ान में, 'नई संभावनाओं' के सुनहरे सपने बेचे गए। रोज़ 'रुदाली' (मातम) गाने वाले होठों को आदेश दिया गया— कि अब मांगलिक गीत गाओ। एक पूरे क्षेत्र की जीवन रेखा के भीतर जान गंवाने वाले उन मूक गवाहों के लिए, जमीन के पट्टे और वृक्षारोपण का दिखावा कर अश्रुपूरित श्रद्धांजलि का नाटक किया गया। प्रधानमंत्री सड़क पर सरपट दौड़ती धूल उड़ाती गाड़ियों के भीतर के दर्द को छुपाकर, साल के दस हजार रुपयों की खैरात का 'हंसता हुआ मुखौटा' परोस दिया गया। ईंट-भट्ठे में अपनी जवानी खोने वाली वह कुंवारी लड़की, स्कूल से लौटते वक्त रास्ते से गायब हो गई वह तरुणी, कन्याश्रम (हॉस्टल) में जबरन मातृत्व को झेलती वह किशोरी, और भरी सड़क पर निर्वस्त्र की गई वह बेबस नारी— इन सबकी चीखती हुई खबरों को अखबारों के पन्नों से गायब कर दिया गया। असमय की बारिश से प्यास बुझाता वह अंकुरित बीज, सांझ की दीया जलाकर, घूंघट संभालती और बुदबुदाते हुए ढोक लगाती वह कुलवधू, मंदिर के बजते घंट-घड़ियाल और आरती के स्वर से गूंजता हुआ वह ग्रामीण परिवेश, नदी के कछार से घिरता हुआ वह अंधेरा, और भूतिया रोशनी के साथ गूंजती सियार की वह भयावह हुआं-हुआं की आवाज़— सब कुछ धीरे-धीरे एक अजीब खामोशी में दफन हो रहा था। ये 'अवतारी पुरुष' (ढोंगी मसीहा) जहां भी गए, वहां पुराना इतिहास मिटाकर एक नया इतिहास लिख दिया…
