तुम्हारे सिखाए हुए शब्द
तुम्हारे सिखाए हुए वे शब्द, जब से निशब्द (मौन) हो गए हैं, इस रुलाई और आंसुओं के बीच, सांसारिक मोह भी टूट-टूट कर बिखर जाता है। समय के साथ उम्र की लकीरें तो बढ़ती हैं, पर यह मन कभी बड़ा (वयस्क) नहीं हो पाता। "माँ..." शब्द गले से बाहर निकल नहीं पाता, और सीने के भीतर बहुत तड़पाता है। इससे पहले कि बच्चे के हाथ इस काबिल हो सकें, ईश्वर अपने ही प्रतिरूप (माँ) को वापस छीन लेते हैं। बिना रंगों के, बिना किसी कैनवास के, एक छवि अंकित करनी पड़ती है यादों में। आँगन के तुलसी-चौंरे पर संझा की दीया तो जलती है, पर घर के भीतर जो दीया बुझ गया, उसका स्थान हमेशा के लिए सूना रह जाता है। रात के सपनों में बार-बार टूटती हुई नींद, मान-अभिमान के भंवर में घुटता हुआ यह मन, अपने दिल की बात किसी से न कह पाने वाले ये होठ, और तुम्हारी अनुपस्थिति के ३६५ दिन गिनती ये उंगलियां। कोई आएगा या नहीं आएगा... इन सब भावनाओं को, अब खुद ही संभालना पड़ता है। कोई न कोई आकर समझा ही जाता है कि— "जो होना था, वही हुआ है।" पर सब कुछ पढ़ने, सब कुछ सुनने और सब कुछ समझ लेने के बाद भी... वह एक शब्द, "माँ..." भीतर से बाहर आने का रास्ता ढूंढता ही रहता है। —————– — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English…
