तुम्हारी हज़ारों बंदिशों के बावजूद भी
तुम्हारी हज़ारों बंदिशों (मनाही) के बावजूद भी, मैंने उनमें लाख बार तुम्हारी सहमति को महसूस किया है। आँखों की एक पलक झपकने से भी सब समझ आ जाता है; मौन होठों से भी बड़ी आसानी से पढ़ी जा सकती है दिल की जुबाँ। दिल की बात कहने के लिए किसी तन्हा और एकांत दुनिया की दरकार नहीं होती। भीड़ के बीच भी महसूस की जा सकती है मोहब्बत की एक नई परिभाषा। मन को बहलाने के लिए ज़रूरी नहीं हैं मलयगिरि की शीतल हवाएँ, हसीन बाग़-बगीचे, आसमान का इंद्रधनुष, सर्दियों की ठंडी हवा, झरनों का संगीत या फूलों की बहार। शोर-शराबे और कोलाहल के बीच भी प्रेम को समझा जा सकता है— एक दिल को पहचानने के लिए बस एक दिल की ही तो चाह होती है। किसके शासन (अधिकार) की बेड़ियों के कारण तुम्हारे पैरों में खिंची है यह लक्ष्मण रेखा? किसकी आँखों की सख्ती और पाबंदी की वजह से तुम्हारी आँखों से बहती है सावन की यह अनवरत धार? किसके आँगन के चौरे (तुलसी मंच) पर तुम मजबूर हो साँझ का दीया जलाने के लिए? यहाँ एक जोड़ी आँखें न जाने कब से ढूँढ रही हैं इस आँगन में तुम्हारे कदमों के निशान और तुम्हारी नज़रों की वह चंचलता। लोग कहते हैं कि बारिश आती है मिलन की ऋतु का चक्र लेकर। पर यहाँ तो विरह की भीषण आग में जल रहा है यह पूरा का पूरा हरा-भरा जंगल, जो तरस रहा है तुम्हारे कोमल हाथों के स्पर्श और प्रेम की उस शीतलता के लिए। — रत्नमय त्रिपाठी…
