हे चंचल आँखों वाली सुंदर चंद्रमुखी सुंदरी!
तुम्हारी वाणी चातुर्य, चपलता और मोहक छलावे से भरी है।
एक चतुर स्त्री की तरह एक चंचल, तरंगित मन लेकर,
तुम राहों के अनगिनत रंगों को गिनती हुई चलती जाती हो।
चंपा के फूलों को चुनते समय तुम्हारे
चंद्रमा जैसे मुखड़े पर जब अद्भुत चमक बिखरती है,
तब चपल भँवरें अपने पूरे दल-बल (फ़ौज) के साथ,
सहसा चौंककर डर के मारे भाग खड़े होते हैं।
तुम्हारी घुँघराली अलकें (लटें) जब तुम्हारी ठोड़ी को चूमती हैं,
तब सुंदर भृकुटी (भौंहों) से सजा तुम्हारा मुख किसी चित्र सा प्रतीत होता है।
चीन के रेशम (चीनांशुक) से बने महीन वस्त्र धारण किए हुए,
तुम्हारा यह पूरा रूप चंदन के लेप से सुवासित है।
चार मुख वाले ब्रह्मा ने चारों युगों तक कठिन परिश्रम करके,
बैठकर तुम्हारी इस अनुपम छवि को गढ़ा है।
फिर ऐसी मायाविनी बनकर तुम भला इस चिर-कुमार (ब्रह्मचारी) को,
अपने प्रेम के इस चक्रव्यूह (चक्रबंध) में बाँधने क्यों चली आती हो?
— रत्नमय त्रिपाठी
अध्ययन, बलांगीर
Original Odia : Ratnamaya Tripathy
Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy
Ratnamaya Tripathy now presents a poem showcasing “Cha-Anuprasa” (Alliteration of the letter ‘Cha’ / ଚ-ଅନୁପ୍ରାସ). Every single word in this verse begins with the letter “Cha” (ଚ), pulling from highly sophisticated, classical Odia vocabulary to describe the mesmerizing, almost divine beauty of a woman and the sweet entrapment of her love.
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