सिर्फ इसलिए कि तुमने कहा था…
प्रतीक्षा में बीता हुआ सारा समय सड़-गल कर कभी नष्ट नहीं हुआ। जनमदिन की मेज़ पर मोमबत्तियों की संख्या अपनी मर्ज़ी से नहीं बढ़ी थी। भँवरे ने जानबूझकर रास्ता नहीं भूला था, न ही ऋतुचक्र के बदलने से बदले थे बगीचे के फूल। ऐसी कविताएँ कभी यूँ उमड़कर डायरी के पन्नों पर नहीं उतरतीं; फरार (लापता) हो चुके शब्द कभी इस तरह बात नहीं मानते। यह हलाहल (विष) कभी इस तरह अमृत में नहीं बदलता। हरसिंगार (गंगाशिउली) की महक से गुलाब की कली कभी यूँ नहीं मुरझाई थी। दूर देश के पंछियों के लौट जाने के बाद भी, घोंसला कभी बिखरा हुआ नहीं था। चक्रव्यूह के भीतर से भी लौट आए थे अभिमन्यु। ययाति ने स्वेच्छा से मोह का त्याग कर लौटा दी थी उधार ली हुई जवानी। नदियाँ भले ही राह भटक कर सागर में न मिल पाई हों, पर सागर की प्रेममयी लहरें कभी कम नहीं हुईं। चोर-बालू (दलदल) पर बने कदमों के निशान मिट जाने के बाद भी, रास्ता साफ़ मालूम पड़ रहा था। देखो, सिर्फ इसलिए कि तुमने कहा था, बसंत ने भी अभी तक आँगन नहीं छोड़ा है। अगर वादे ही भुला दिए जाएँ, तो यहाँ कौन अपना (जाना-पहचाना) है और कौन पराया (अन्जान)? — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here
