एक डूबी हुई सभ्यता की कहानी

सैकड़ों विस्थापितों के इन मासूम चेहरों में से मैं किससे कहूँ कि वह सुनाए जलभराव (जलमग्न होने) की यह व्यथा? कौन बताएगा कि कैसे डूब गया— अपने गाँव का मंदिर, श्मशान और वह स्कूल की इमारत, बचपन में जहाँ 'डाही-मांकड़ी' (पेड़-बंदर का खेल) खेलते थे वह आम का बगीचा, बाप-दादा के ज़माने से भोग पाती आ रही ग्राम-देवी की कुटिया, भाइयों के बँटवारे में हिस्से में आई सहजन की बाड़ी, और जहाँ रोज़ "हे प्रभु! तू ही रक्षा कर, मैं तो मात्र एक साधारण जीव हूँ" गाया जाता था— उस 'भागवत टुंगी' (धार्मिक चौपाल) के डूबने की कहानी। कैसा लगा था छाती के भीतर जब काटा जा रहा था गाँव का वह बरगद का पेड़? जहाँ मन्नत का धागा बाँधकर सोलह मंगलवार का व्रत करने के बाद बड़ी बेटी विदा होकर ससुराल गई थी। चार बेटियों के बाद एक बेटे की चाह में, जिस मंदिर की सीढ़ियों पर रोज़ नंगे बदन लेटकर मन्नतें माँगी थीं, जब उस पर बुलडोज़र चला— तो कलेजे पर कैसी चोट लगी होगी? 'महुलझार' में प्रेमिका के साथ भीगी हुई पहली बारिश का वह अनुभव अब सिर्फ यादों में है, क्योंकि महुए के वे सारे पेड़ अब जल-कैदी (पानी में दफन) हैं। जब से होश सँभाला था, तब से हम सुनते आ रहे थे— इस गाँव में चौड़ी सड़क बनेगी, नहर के पानी से दो-फसली खेती होगी, खेत मुस्कुराएँगे, किसान मुस्कुराएगा, अब कभी किसी को 'दादन' (प्रवासी मज़दूर) बनकर बाहर नहीं जाना पड़ेगा, ईंट-भट्ठों में मज़दूरी नहीं करनी पड़ेगी, ठेकेदार (सरदार) की लाल आँखें (जुल्म) नहीं…

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उड़ान

मैं अपने ही भीतर सिमट गया, बसेरा छोड़कर उड़े सारे पक्षी अब लौट आए हैं। पक्षी के एक नन्हे बच्चे ने सुबह को टकटकी लगाकर देखा, दूर का पहाड़ और नज़दीक चला आया, और आत्मीयता का भाव और गहरा हो गया। आजकल मुझे अपना शहर बहुत अच्छा लगता है— विकास की राह पर बढ़ती ये सड़कें। विस्थापितों के लिए "सबके लिए घर, घर में नल, नल में जल" सुन-सुनकर मैं बहुत खुश हुआ। खुद को अपने ही भीतर ढूंढ पाना ही ज़िंदगी है। समय के साथ धीरे-धीरे जुड़ते हुए रिश्तों को सदा जोड़े रख पाना ही ज़िंदगी है। किसी को अपने सीने (दिल) में थोड़ी सी जगह देना ही आत्मीयता है, और किसी की आँखों से एक बूंद आँसू भी न बहने देना शायद यही प्रेम है। मैं प्रेम का कोई दूसरा अर्थ नहीं जानता, मैं नहीं जानता कि मैं किससे प्रेम करूँगा। मैं नहीं बता सकता प्रेमिका की आँखों का पता, मैं नहीं बता सकता कि क्यों नींद उड़ जाती है किसी के पायलों की झंकार से। मैं नहीं बता सकता कि कितनी आत्मीयता होती है प्रेमिका के गहरे आलिंगन में। मैं नहीं समझ पाता कि प्रेमिका की हँसी में मुक्ति है या बंधन, कामना है या सिर्फ एक छलावा। मैं तो बस चाहता हूँ कि मुक्ति का एक मार्ग हो, खुद जीकर दूसरों को भी जीने देने की एक सुंदर भावना हो। प्रेम हो या न हो, पर शुभकामनाओं का वह प्रेम-पक्षी मुक्त आकाश में सदा अपनी उड़ान भरता रहे। — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia :…

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समय की प्रतीक्षा में…

श्रावण की वर्षा से भीगी हुई मिट्टी में बो दो स्मृतियों के सारे बीज। वे अंकुरित हों या न हों, आशा और विश्वास की खाद देकर नोच लो निराशा की अनचाही, जंगली घास को। प्रतीक्षा करो… प्रतीक्षा करो… परंतु, 'अमृत काल' में रोपे गए पेड़ पर अमृत ही फलेगा— यह अंधविश्वास मत रखना। दूर क्षितिज पर दिखते हुए इंद्रधनुष से चुन लो वह रंग जो तुम्हें रास आए। उस रंग को लेकर राजनीति करो, ईश्वर को गढ़ो, या फिर खुद ही ईश्वर के दूत बन जाओ! एक नया इतिहास रचा जा चुका है, अब अपना मुंह बंद रखो और उसका समर्थन करो। राजमार्ग पर खड़े होकर घोषणा करो अपनी जाति की, अपने इतिहास की और अपनी जन्मभूमि की! नदी के कछार पर खिले काश-फूलों (काशतंडी) की ओट में मत छुपाओ अपनी इस कलंकित देह को। पारिजात के रंगों में भीगे अपने इस मन को किस नदी के पानी में धोओगे? किस घाट पर नहाकर पवित्र करोगे अपनी आत्मा को? किस पहाड़ की चोटी पर जाकर घोषणा करोगे अपनी राष्ट्रीयता की? प्रतीक्षा करो… बोए हुए स्मृतियों के वे सारे बीज चट्टान को चीरकर ऊपर उठेंगे। सफलता की फसल बटोरकर, यह जाति, यह देश फिर से मुस्कुराएगा। —————– — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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अब खामोशी का मौसम है

अब, फिर से कुछ समय के लिए मौन (खामोश) रहना होगा। पानी के भीतर फेंके गए एक छोटे से कंकड़ की तरंगों से जो सुनामी उठी है, अब उसका सामना करना होगा। कौन जानता था कि बहते पानी में तैर कर आए एक केकड़े के डंक से, यूं ही मिट जाएगा एक पुराना और गहरा रिश्ता! अब कोई नया रिश्ता बनाए बिना, बस मौन रहना होगा। कभी-कभी आईना भी झूठ बोल जाता है, और अपनी ही परछाई भूल कर बैठती है ज़िंदगी के सारे गणित में। कौन जानता था कि नए रोपे गए पेड़ इतनी जल्दी विषैले फल देंगे! अब इस सारे हलाहल (ज़हर) को पीकर, नीलकंठ बनना होगा। राह भटके मुसाफिर को रास्ता मत दिखाओ, भूखे को एक बूंद मांड (तोराणी) भी मत दो। क्या पता, सहायता के लिए बढ़ाए गए उसी हाथ में, लोहे की ज़ंजीरें बांधनी पड़ जाएं! झूठ और सच के इस चौसर के खेल में, झूठ जीत जाता है। सच को सच कहने का मौका तक नहीं मिलता। समय की टिक-टिक करती आवाज़ को खुद में सोखकर, अब बहुत दिनों तक, मौन रहना होगा... —————– — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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अभी कुछ शब्द कहने बाकी हैं

अभी कुछ शब्द कहने बाकी हैं, अभी कुछ शब्द सुनने बाकी हैं। पूरे करने बाकी हैं कुछ वादे, चुकाने बाकी हैं कुछ ऋण। कुछ अनाम कविताओं को अभी शीर्षक देना बाकी है, शब्दों के कुछ पेड़ों को अभी यत्न से बड़ा करना बाकी है। जो लोग बिना कुछ कहे चले गए, उनकी स्मृति में अभी मौन रहना बाकी है। लेन-देन के इस संसार से जाते समय जो आत्माएं कुछ साथ नहीं ले गईं, उनसे उनकी अर्जित धन के मालिकाना हक के बारे में पूछना बाकी है। बाकी है अभी बही-खाते का हिसाब, बाकी है अभी देव-ऋण का हिसाब, बाकी है अभी देशभक्ति का हिसाब। उम्र की उन अनगिनत, रातों की बेकरारी और अनकहे लम्हों को, सुबह होने से पहले, किनारे तक पहुँचाना बाकी है। लगाए हुए कृष्णचूड़ा (गुलमोहर) के पेड़ पर अब फूल नहीं आते, सारे पत्ते झाड़ चुके उस बगीचे में एक बार फिर, पानी सींचना बाकी है। मिट्टी से आसमान की दूरी को मापते-मापते, जितनी भी उम्र थी, वह अब समाप्त हो चुकी है। क्षितिज को देखने के बाद, अब खुद पर ही एक आत्म-व्यंग्य की हंसी हंसना बाकी है। अभी-अभी ऊपर की ओर उठे हुए हाथ को सीधा कर, अपने प्रिय शहर के सीने से अपना नाम मिटाकर, बस एक अंतिम शब्द कहना बाकी है... "विदा।" —————– — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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तुम्हारे सिखाए हुए शब्द

तुम्हारे सिखाए हुए वे शब्द, जब से निशब्द (मौन) हो गए हैं, इस रुलाई और आंसुओं के बीच, सांसारिक मोह भी टूट-टूट कर बिखर जाता है। समय के साथ उम्र की लकीरें तो बढ़ती हैं, पर यह मन कभी बड़ा (वयस्क) नहीं हो पाता। "माँ..." शब्द गले से बाहर निकल नहीं पाता, और सीने के भीतर बहुत तड़पाता है। इससे पहले कि बच्चे के हाथ इस काबिल हो सकें, ईश्वर अपने ही प्रतिरूप (माँ) को वापस छीन लेते हैं। बिना रंगों के, बिना किसी कैनवास के, एक छवि अंकित करनी पड़ती है यादों में। आँगन के तुलसी-चौंरे पर संझा की दीया तो जलती है, पर घर के भीतर जो दीया बुझ गया, उसका स्थान हमेशा के लिए सूना रह जाता है। रात के सपनों में बार-बार टूटती हुई नींद, मान-अभिमान के भंवर में घुटता हुआ यह मन, अपने दिल की बात किसी से न कह पाने वाले ये होठ, और तुम्हारी अनुपस्थिति के ३६५ दिन गिनती ये उंगलियां। कोई आएगा या नहीं आएगा... इन सब भावनाओं को, अब खुद ही संभालना पड़ता है। कोई न कोई आकर समझा ही जाता है कि— "जो होना था, वही हुआ है।" पर सब कुछ पढ़ने, सब कुछ सुनने और सब कुछ समझ लेने के बाद भी... वह एक शब्द, "माँ..." भीतर से बाहर आने का रास्ता ढूंढता ही रहता है। —————– — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English…

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आवरण

कुछ मुखर शब्दों को घूंघट (ओढ़नी) थमा दी गई, रात के अंधेरे में किए गए पाप-कर्मों पर परदा डाल दिया गया। सुबह की ढलती धूप में, और असमय आए इस तूफ़ान में, 'नई संभावनाओं' के सुनहरे सपने बेचे गए। रोज़ 'रुदाली' (मातम) गाने वाले होठों को आदेश दिया गया— कि अब मांगलिक गीत गाओ। एक पूरे क्षेत्र की जीवन रेखा के भीतर जान गंवाने वाले उन मूक गवाहों के लिए, जमीन के पट्टे और वृक्षारोपण का दिखावा कर अश्रुपूरित श्रद्धांजलि का नाटक किया गया। प्रधानमंत्री सड़क पर सरपट दौड़ती धूल उड़ाती गाड़ियों के भीतर के दर्द को छुपाकर, साल के दस हजार रुपयों की खैरात का 'हंसता हुआ मुखौटा' परोस दिया गया। ईंट-भट्ठे में अपनी जवानी खोने वाली वह कुंवारी लड़की, स्कूल से लौटते वक्त रास्ते से गायब हो गई वह तरुणी, कन्याश्रम (हॉस्टल) में जबरन मातृत्व को झेलती वह किशोरी, और भरी सड़क पर निर्वस्त्र की गई वह बेबस नारी— इन सबकी चीखती हुई खबरों को अखबारों के पन्नों से गायब कर दिया गया। असमय की बारिश से प्यास बुझाता वह अंकुरित बीज, सांझ की दीया जलाकर, घूंघट संभालती और बुदबुदाते हुए ढोक लगाती वह कुलवधू, मंदिर के बजते घंट-घड़ियाल और आरती के स्वर से गूंजता हुआ वह ग्रामीण परिवेश, नदी के कछार से घिरता हुआ वह अंधेरा, और भूतिया रोशनी के साथ गूंजती सियार की वह भयावह हुआं-हुआं की आवाज़— सब कुछ धीरे-धीरे एक अजीब खामोशी में दफन हो रहा था। ये 'अवतारी पुरुष' (ढोंगी मसीहा) जहां भी गए, वहां पुराना इतिहास मिटाकर एक नया इतिहास लिख दिया…

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अभिमान

सब कुछ तो लौट आया है… एक बार फिर उस ठूंठ पेड़ पर कौंपलें फूट पड़ी हैं। बाड़ी के आम के पेड़ पर बौर आ गए हैं। मल्लिक (मोगरे) की महक से आँगन महक उठा है। फाल्से के सारे पेड़ लाल फूलों से भर गए हैं। अकेले उड़ते पक्षियों ने चुन लिए हैं अपने-अपने बसेरे। अब पार्क में खाली नहीं बचता एक भी बेंच। गुपचुप (गोलगप्पे) के ठेले के पास भारी भीड़ उमड़ती है। फूलों की दुकान पर नहीं बचता एक भी बासी फूल। अब पहले की तरह, गलत पते पर नहीं भटकती एक भी चिट्ठी। नए-नए खरीदे गए रेडियो पर रोज़ बजते हैं सदाबहार गीत। तुम्हारे आने की राह को टकटकी लगाकर देखने वाले लोग, अब 'मनरेगा' के काम में व्यस्त हैं। खुसर-पुसर बातें करने वाली वे अनपढ़ औरतें, अवैध कब्जा हटाओ अभियान के कारण शहर से बाहर हो चुकी हैं। 'आज़ादी का अमृत महोत्सव' में, तिरंगी रोशनी के साथ जगमगा रहा है मेरा प्रिय शहर। विकास और विस्थापन दोनों एक साथ मिलकर खेलते हैं फागुन का अबीर। सब कुछ तो लौट आया है… समय के साथ कोई भी नहीं रूठा। तुम ऐसा कौन सा अभिमान (नाराज़गी) लेकर चले गए कि— गर्मी, बरसात और सर्दी बीत गई, बसंत भी लौट आया, पर तुम नहीं आए। — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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तुम्हारी पुण्य-यात्रा की अर्थी पर

तुम्हारी पुण्य-यात्रा की अर्थी पर, समर्पित हैं मेरे आंसू, भरा हुआ कंठ, और श्रद्धा के सुमन। किसी का ऋणी न रहने का तुम्हारा वह संकल्प, मुझे जन्म-जन्मों के लिए तुम्हारा ऋणी कर गया। लोग कहते हैं समय बीत जाने पर अभिनय समाप्त हो जाता है, "सब कुछ खत्म हो गया" के उस अंतिम संवाद के साथ— साहस टूट जाता है, और विश्वास भी दम तोड़ देता है, उस आखिरी सांस के साथ। सांत्वना के लिए बढ़े किसी और के हाथ में, वह आत्मीयता का भाव कहाँ होता है! पत्ते पर परोसा हुआ वह मुट्ठी भर भात ही बताता है, कि अब तुम हमारे बीच नहीं रहीं। क्या सब माताएं अपना बसेरा ऐसे ही छोड़ जाती हैं? बच्चों के पंखों में उड़ने की ताकत भरने के बाद, वे खुद उन्हें समंदर पार करते हुए नहीं देखतीं। सारे घर को सजाकर, सहेजकर, वे बटोरती रहती हैं अपने सारे कर्मफल। वे ओषा-व्रत और मन्नतें सब धरी रह जाती हैं, पूजा घर के ताक पर सजे हुए। अचानक, "माँ..." की वह पुकार दूर चली जाती है, श्मशान के करीब। अंतिम यात्रा की उस भीड़ में, जीवन भर के पुण्य-फल आंसू बनकर बह रहे होते हैं। —————– — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here

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