सोच रहा हूँ इस बार, मौन के बंधन में छटपटाते हुए कुछ शब्दों को आज़ादी दे दूँगा। कुछ स्मृतियों और अनुभवों को पिंजरे से निकालकर बाहर का रास्ता दिखा दूँगा। बहुत दिनों से जो एक अधूरी प्रतीक्षा थी, उसे अब कविता का रूप नहीं दूँगा। हृदय में सहेजकर रखे हुए प्रेम को, अब राहों में बिखेर (बाँट) दूँगा। जाने-पहचाने चेहरों को जानबूझकर, अब अनजाना समझूँगा। फ़ोन में सहेजे (Save) गए सारे नंबर, अब डिलीट कर दूँगा। तुम्हारी उस चुनौती का कोई प्रतिउत्तर, मैं अब देना नहीं चाहता। तुम जानते हो कि मैं जीतूँ या न जीतूँ, पर तुम्हें कभी हारने नहीं दूँगा। तुम्हारे अभिमान (रूठने) के श्राप से, अब मैं घाट का एक पत्थर बन चुका हूँ। चाहो तो इस पर अपने पाँव पखार (धो) लो, या फिर इसे ले जाकर अपने हृदय का ईश्वर गढ़ लो। — रत्नमय त्रिपाठी अध्ययन, बलांगीर —————–Original Odia : Ratnamaya Tripathy Translated by : Dr. Khyatimaya Tripathy Want to read this poem in Odia ? Click Here Want to read this poem in English ? Click Here