तुम एक महकता गुलाब हो…

आसपास जब तुम्हारे  चुभते  कांटे  हो  तो  मान लो  कि तुम एक महकता गुलाब हो अपमान हो, तिरस्कार हो,ताने की बौछार हो  बात-बात पर अपने मुकर जाए, बदल जाए  सीधा चलने पर भी लोग उलट  वार करें तो  मान लो कि तुम एक  बहता सैलाब हो l आसपास जब तुम्हारे चुभते  कांटे हो तो  मान लो कि तुम एक महकता गुलाब हो  हर घड़ी हर पल स्वयं की परीक्षा देनी पड़े  दमबदम अपने वज़ूद का सबूत देना पड़े  कदम कदम पर सवाल पूछना पड़े तो   मान लो  कि तुम एक माकूल जवाब होl  आसपास जब तुम्हारे  चुभते  कांटे  हो  तो  मान लो  कि तुम एक महकता गुलाब हो काबिलियत का लोहा दुनिया ने मानी हो  अपनी किस्मत की कहानी खुद लिखी हो  संघर्षों के अक्षर से संकल्प सिद्धि पढ़ी हो  तो मान लो कि तुम इंकलाबी किताब हो l  आसपास जब तुम्हारे  चुभते  कांटे  हो  तो  मान लो  कि तुम एक महकता गुलाब हो  कट जाए भले लेकिन झुकना नहीं जानते  भटक जाए पर वापस मुड़ना नहीं जानते  जीत मिले ना मिले मगर हारना नहीं जानते  तो मान लो कि तुम एक शाही नवाब होl  आसपास जब तुम्हारे  चुभते  कांटे  हो  तो  मान लो  कि तुम एक महकता गुलाब हो तुम्हारा नजरिया जब तुम्हें खूबसूरत बनाएं  तुम्हारे हुनर को नजाकत से निहारा जाए  लाख चाहने पर भी कोई तुम्हें छू ना पाए  तो मान लो  कि  तुम एक हसीन  ख्वाब हो  आसपास जब तुम्हारे  चुभते  कांटे  हो  तो  मान लो  कि तुम एक महकता गुलाब हो  चतुर्दिक्  विषाद के बीच…

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ओम जय जगदीश हरे

ॐजयजगदीशहरे, स्वामीजयजगदीशहरे। भक्तजनोंकेसंकट, दासजनोंकेसंकट, क्षणमेंदूरकरे॥ ॥ॐ जय जगदीश हरे..॥ जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मनका, स्वामी दुःख बिनसे मनका। सुख सम्पति घर आवे, सुख सम्पति घर आवे, कष्टमिटे तनका॥ ॥ॐ जय जगदीश हरे..॥ मातपिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी, स्वामी शरण गहूं मैं किसकी। तुमबिन औरन दूजा, तुमबिन और न दूजा, आस करूंमैं जिसकी॥ ॥ॐ जय जगदीश हरे..॥

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देवी सूक्तम् (या देवी सर्वभूतेषु…)

नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः। नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम् ।।1।। रौद्रायै नमो नित्यायै गौर्यै धात्र्यै नमो नमः । ज्योत्स्नायै चेन्दुरुपिन्यै सुखायै सततं नमः ।।2।। कल्याण्यै प्रणतां वृद्ध्यै सिद्ध्यै कुर्मो नमो नमः । नैर्ऋत्यै भूभृतां लक्ष्म्यै शर्वाण्यै ते नमो नमः ।।3।। दुर्गायै दुर्गपारायै सारायै सर्वकारिण्यै । ख्यात्यै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नमः ।।4।।

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